नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। बिहार की सियासत में कांग्रेस ने नए दाव पेंच चले है। बिहार में कांग्रेस के कमजोर आधार का हवाला दिया जाता रहा है लेकिन अब वह आरजेडी की हैसियत के शिखर पर पहुंचने की योजना बना रही है। कांग्रेस का ये ताजा कदम न केवल सियासी हलचल पैदा कर रहे हैं, बल्कि लगातार चौंका भी रहे हैं।
हाल ही में चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) लिस्ट जारी की है जिसमें करीब 65 लाख वोटर्स को वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया है। इसमे सियासी टकराव भी भरपूर देखने को मिला है। इस बीच, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 10 अगस्त से 26 अगस्त तक बिहार में पदयात्रा निकालने का ऐलान कर चुके है। कांग्रेस नेता की ये पदयात्रा 18 जिलों से हो गुजरेगी। और महागठबंधन के साथ मिलकर विपक्ष की ताकत का प्रदर्शन करेंगी।
लेकिन इस पदयात्रा से पहले हाल ही में बिहार कांग्रेस चीफ राजेश राम और अन्य नेताओं की इमारत- ए-ं शरिया के मौलानाओं से मुलाकात के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है। इस मुलाकात ने सभी राजनीतिक दलों का ध्यान अपनी और खींचा है। इमरान प्रतापगढ़ी जैसे प्रभावशाली नेताओं को बिहार में सक्रिय किया गया है जो मुस्लिम समुदाय में खासा असर दिखा रहे है।
बिहार की सियासत में कांग्रेस का ये बड़ा कदम
पॉलिटिकल एक्सपर्ट इस ‘सियासत’ को अलग नजरिये से देख रहे हैं और कहते हैं कि ये कदम संकेत दे रहे हैं कि कांग्रेस मुस्लिम वोटों को अपने खेमे में लाने के लिए एक बेहतर रणनीति के साथ काम कर रही है। बता दें कि बिहार में मुस्लिम आबादी करीब 18% है जो सीमांचल, मिथिलांचल और मगध की 63 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है। ऐसे में सभी सियासी दलों की नजर इन समुदाय के मतदाताओं पर है।
कांग्रेस का प्लान, क्या बढ़ेगी RJD की मुश्किलें?
जाहिर है कि कांग्रेस की यह रणनीति महागठबंधन, विशेष कर RJD के लिए मुश्किले खड़ी कर सकती है। क्योंकि, RJD का पारंपरिक वोट बैंक मुस्लिम-यादव रहा है। 2015 में महागठबंधन को 80% मुस्लिम वोट मिले थे, लेकिन 2020 में यह इसका ग्राफ नीचे आ गया था। जब AIMIM ने सीमांचल में 5 सीटें जीतकर RJD के वोट बैंक में सेंधमारी की। ऐसे में अगर कांग्रेस मुस्लिम वोटों को अपने पाले में लाने में सक्षम रही तो RJD का वोट आधार और कमजोर पड़ सकता है।
कर्नाटक-तेलंगाना मॉडल लागू करने का प्लान?
पॉलिटिकल एक्सपर्ट मानते हैं कि कांग्रेस की यह रणनीति कर्नाटक, तेलंगाना और केरल की तर्ज नजर आती है। जहां उसने मुस्लिम समुदाय का भरोसा जीतकर अपनी स्थिति मजबूत की। बिहार में अगर ऐसा हुआ तो कांग्रेस न केवल महागठबंधन में अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाएगी, बल्कि खुद को एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में भी स्थापित कर सकती है।
वही, राजनीति घटनाक्रम पर नजर रखने वाले सीनियर पत्रकार कहते है कि “मुस्लिम वोटर अब उस उम्मीदवार को चुन रहे हैं जो बीजेपी को हराने की सबसे ज्यादा संभावना रखता हो” कांग्रेस इस भावना को भुनाने की कोशिश में है। यही कारण है कि बार-बार वक्फ कानून और SIR जैसे मुद्दे पर मुकर है।
असदुद्दीन ओवैसी की राजनीति को खतरा?
असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM बिहार में मुस्लिम वोटों के लिए एक बेहतर ऑप्शन बन के सामने आई थी। AIMIM ने 2020 में 5 सीटें जीतीं, लेकिन हाल में महागठबंधन में वो शामिल नहीं हो पाई। कांग्रेस की सक्रियता से ओवैसी के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
ओवैसी ने भी की तगड़ी तैयारी
माना जा रहा है कि, अगर कांग्रेस मुस्लिम वोटरों को अपने साथ जोड़ लेती है तो AIMIM के वोट शेयर में गिरावट आ सकती है। हालांकि, ओवैसी 45 सीटों पर अकेले लड़ने की तैयारी में हैं जो महागठबंधन को अप्रत्यक्ष रुप से झटका दे सकते है। बावजूद इसके अगर कांग्रेस चुनाव मैदान में पूरी ताकत के साथ प्रदर्शन करती है तो संभव है कि मुस्लिमों का भरोसा कांग्रेस पर अधिक हो जाएगा।
कांग्रेस की क्या है खास रणनीति?
अब सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस बिहार में अकेले दम पर लड़ेगी या महागठबंधन में रहकर अपनी ताकत को धार देंगी? इस पर सीनियर पत्रकार कहते है कि कांग्रेस अगर अकेले लड़ी, तो बीजेपी को नुकसान होगा, लेकिन अभी गठबंधन में रहना उसके लिए फायदेमंद है।
सवर्ण, दलित और मुस्लिम RJD से खफा
उन्होने कहा कि, राहुल गांधी के हाल के बिहार दौरे और “नौकरी दो, पलायन रोको” यात्रा से पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरा है। हालांकि, कांग्रेस को सवर्ण, दलित और मुस्लिम वोटों के बीच तालमेल बनाना है, क्योंकि उसका आधार वोट सवर्ण भी है जो RJD के साथ गठबंधन से खफा है।
क्या कांग्रेस की बदलेगी तस्वीर?
कांग्रेस लंबे समय से बिहार की सत्ता से बाहर रही है। इस बार के चुनाव में यह एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। हालांकि, कांग्रेस की यह कवायद बिहार की सत्ता से बेदखल हुए अब वह बहाल करने की कोशिश रहेंगी। कभी लालू यादव के तंज का शिकार रही कांग्रेस अब “बी” नहीं, “ए” पार्टी बनने की राह पर आगे बढ़ती दिख रही है। कांग्रेस अपने पुराने आधार वोट को भी पुख्ता और मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
संगठन को मजबूत करने में लगी पार्टी
वह दलित-पिछड़ों के साथ-साथ मुस्लिम, ओबीसी समुदाय और सवर्णों को भी अपने पाले में करने में लग गई है। इस बीच अगर मुस्लिम वोटर कांग्रेस की ओर जाता है तो वह न केवल RJD पर दबाव बनाएगी, बल्कि बीजेपी-जेडीयू गठबंधन के लिए भी चुनौती पेश करेगी। हालांकि, यह रणनीति तभी कामयाब होगी जब कांग्रेस जमीन पर संगठन को मजबूत करे और गठबंधन के भीतर संतुलन बनाए रखे। फिलहाल, कांग्रेस इन सब चीजों से निपटने की कोशिश कर रही है।




