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Friday, March 20, 2026
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Cannes 2025 : अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय सिनेमा की गूंज, इन तीन फिल्मों की कान में होगी स्क्रीनिंग

कान फिल्म महोत्सव को (International Film Festival) इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल कहा जाता था। फ्रांस के कान में आयोजित होने वाला यह महोत्सव में दुनियाभर की फिल्मों की स्क्रीनिंग की जाती हैं।

नई दिल्‍ली / रफ्तार डेस्‍क । सूरज की पहली किरणों ने फ्रेंच रिवेरा की चमकती लहरों को छुआ, वैसे ही कान फिल्म फेस्टिवल का रेड कार्पेट भी सितारों की चहल-पहल के लिए तैयार हो गया। 78वें संस्करण की भव्य शुरुआत ने सिनेमा की विरासत, उसकी वर्तमान यात्रा और भविष्य की संभावनाओं को एक मंच पर लाने का संकल्प जताया है।

इस बार का फेस्टिवल ना सिर्फ प्रतियोगी फिल्मों की बेहतरीन प्रस्तुतियों के लिए खास है, बल्कि इसमें क्लासिक फिल्मों की पुनः प्रस्तुति और उभरती प्रतिभाओं की विशेष झलक भी देखने को मिलेगी। 2025 के इस संस्करण में भारत की तीन फिल्मों ने वैश्विक सिनेमा में अपनी खास जगह बनाई है। इन फिल्मों का कान में चयन होना भारतीय सिनेमा के लिए गर्व का विषय है और इनकी विशेष स्क्रीनिंग अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र होगी। आइये जानते हैं उन फिल्‍मों के बारे में…

‘अरन्येर दिन रात्रि’ (Days and Nights in the Forest) –

कान क्लासिक्ससत्यजीत रे की कालजयी फिल्म अरन्येर दिन रात्रि (1970) को इस वर्ष के कान फिल्म फेस्टिवल के प्रतिष्ठित कान क्लासिक्स सेक्शन में शामिल किया जा रहा है। यह सम्मान उस सिनेमा को दिया जाता है, जो समय की कसौटी पर खरा उतरते हुए आज भी दर्शकों को झकझोर देता है। फिल्म की नवीन पुनर्स्थापना एक अंतरराष्ट्रीय सहयोग का परिणाम है, जिसमें मार्टिन स्कॉर्सेज़ के फिल्म फाउंडेशन, भारत के फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन और क्राइटेरियन कलेक्शन की अहम भूमिका रही है।

यह फि‍ल्‍म चार शहरी युवकों के जंगल की ओर यात्रा पर केंद्रित है, जहां वे प्राकृतिक परिवेश में खुद से और एक अलग जीवन दृष्टिकोण से रूबरू होते हैं। रे की संवेदनशील दृष्टि और गहरी सामाजिक समझ इस फिल्म को आज भी उतना ही प्रासंगिक बनाती है जितनी यह अपने समय में थी। इस चयन के साथ अरन्येर दिन रात्रि न केवल भारतीय सिनेमा की समृद्ध परंपरा को सम्मानित करती है, बल्कि विश्व मंच पर उसकी सांस्कृतिक गूंज को और भी गहराई देती है।

‘चरक’ (The Fear of Faith)

निर्देशक सुदीप्तो सेन की फिल्म चरक (The Fear of Faith) इस वर्ष कान्स में एक साहसिक और भावनात्मक हस्तक्षेप के रूप में सामने आई है। बंगाल की प्राचीन चरक पूजा की पृष्ठभूमि में रची गई यह फिल्म धार्मिक विश्वास, मानसिक द्वंद्व और सामाजिक संरचनाओं के जटिल संबंधों की परतें खोलती है। फिल्म की कहानी एक युवा व्यक्ति के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जिसके भीतर श्रद्धा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच गहराता संघर्ष अंततः उसके शरीर और आत्मा दोनों पर असर डालता है। 

चरक न सिर्फ एक आध्यात्मिक यात्रा है, बल्कि यह उस बारीक रेखा को भी उजागर करती है, जहाँ आस्था कट्टरता में बदल जाती है। अपनी गहन राजनीतिक चेतना, अनसुलझे सवालों और साहसी दृश्यशैली के कारण यह फिल्म आलोचना और विमर्श को आमंत्रित कर रही है। चरक को इस साल के कान्स फिल्म फेस्टिवल में एक संभावित ब्रेकआउट फिल्म के रूप में देखा जा रहा है, जो दर्शकों और समीक्षकों दोनों पर गहरा प्रभाव छोड़ने के लिए तैयार है।

‘होमबाउंड’ 

मसान जैसी समीक्षकों द्वारा सराही गई फिल्म से प्रसिद्धि पाने वाले निर्देशक नीरज घायवान एक बार फिर कान फिल्म फेस्टिवल में अपनी नई पेशकश होमबाउंड के साथ लौटे हैं। इस फिल्म को अन सर्टेन रिगार्ड सेक्शन में शामिल किया गया है, जो वैश्विक सिनेमा में विशिष्ट और प्रयोगधर्मी दृष्टिकोण को सम्मानित करता है। होमबाउंड की कहानी भारत के एक छोटे शहर में पले-बढ़े दो युवकों, ईशान खट्टर और विशाल जेठवा द्वारा निभाए गए किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों पुलिस बल में करियर बनाने की आकांक्षा लेकर आगे बढ़ते हैं, लेकिन जल्द ही खुद को एक ऐसे जटिल और अक्सर अन्यायपूर्ण तंत्र के बीच पाते हैं, जहां सिद्धांत और यथार्थ की दूरी चुभने लगती है।

यह फिल्म केवल व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि छोटे शहरों के युवाओं के भीतर पल रही उम्मीदों, अस्मिता और सामाजिक असमानता के बीच जूझते स्वाभिमान को भी गहराई से छूती है। नीरज घायवान की यथार्थवादी दृष्टि, मानवीय संवेदनाओं और बारीक सामाजिक टिप्पणियों के साथ होमबाउंड भारतीय सिनेमा की उस नई धारा का प्रतिनिधित्व करती है, जो स्थानीय कहानियों को वैश्विक मंच पर पूरी गरिमा के साथ प्रस्तुत कर रही है।

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