नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो (IndiGo) इन दिनों गंभीर परिचालन संकट से गुजर रही है। बीते दो दिनों में एयरलाइन की 280 से अधिक उड़ानें रद्द करनी पड़ीं, जबकि जो उड़ानें संचालित हुईं, उनमें से कई फ्लाइट्स घंटों की देरी से रवाना हुई। हालात ऐसे बन गए कि मंगलवार को इंडिगो की हर 10 में से सिर्फ 3 उड़ानें ही समय पर उड़ सकीं। इससे देशभर के हवाई अड्डों पर यात्रियों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी और एयरपोर्ट पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
दो दिन में बिगड़ा पूरा शेड्यूल
मंगलवार को इंडिगो की करीब 130 उड़ानें रद्द हुईं, वहीं बुधवार को यह संख्या 150 से ज्यादा पहुंच गई। कई प्रमुख एयरपोर्ट-दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोलकाता-पर यात्रियों को घंटों तक इंतजार करना पड़ा। बड़ी संख्या में यात्री टिकट कैंसिल कराने या दूसरी एयरलाइंस में शिफ्ट होने को मजबूर हुए।
DGCA के नए पायलट ड्यूटी और रेस्ट नियम इस संकट की सबसे बड़ी वजह माने जा रहे हैं, जो 1 नवंबर 2025 से लागू हो चुके हैं। नए नियमों के तहत पायलटों को अब हर सप्ताह 48 घंटे का लगातार आराम देना अनिवार्य कर दिया गया है, जो पहले 36 घंटे था। इसके साथ ही रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक की अवधि को नाइट ड्यूटी के तौर पर परिभाषित किया गया है। नाइट ड्यूटी के दौरान पायलट अधिकतम 8 घंटे तक ही उड़ान भर सकेंगे और उनकी अधिकतम ड्यूटी अवधि 10 घंटे तय की गई है। इसके अलावा लगातार रात की ड्यूटी अधिकतम दो दिन तक सीमित कर दी गई है और रात के समय लैंडिंग भी दो बार से अधिक नहीं हो सकेगी।
एयरलाइंस को हर तीन महीने में पायलट थकान को लेकर रिपोर्ट भी देनी होगी। एयरलाइन कंपनियों ने इन नियमों को टालने की अपील की थी, लेकिन DGCA ने सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए इन्हें लागू कर दिया। इंडिगो ने अचानक बढ़ी पायलटों की जरूरत का अंदाजा पहले नहीं लगाया, जिसका असर सीधे उड़ानों पर पड़ा।
तकनीकी खराबी और मौसम ने बढ़ाई मुश्किल
इंडिगो ने उड़ानों के रद्द होने के पीछे तकनीकी गड़बड़ी, खराब मौसम और एयरपोर्ट कंजेशन को भी जिम्मेदार बताया है। हालांकि एयरलाइन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि असली समस्या खराब मैनपावर प्लानिंग रही। सूत्रों के मुताबिक, इंडिगो ने समय रहते न तो पर्याप्त नए पायलटों की भर्ती की और न ही फर्स्ट ऑफिसर्स को कैप्टन के पद पर प्रमोशन की प्रक्रिया तेज की। नतीजतन, जैसे ही नए नियम लागू हुए, कंपनी के पास अतिरिक्त पायलट बफर लगभग शून्य रह गया।
पायलटों पर बढ़ा दबाव
स्थिति संभालने के लिए पायलटों को बार-बार री-शेड्यूल किया गया। कई पायलटों को एक शहर से दूसरे शहर ‘डेडहेडिंग’ यानी पैसेंजर की तरह भेजना पड़ा। लंबी ड्यूटी और अचानक बदलावों से पायलटों पर काम का दबाव और बढ़ गया, जिससे ऑपरेशन और भी प्रभावित हुआ।
विमान भी बन रहे परेशानी की वजह
विमानों की कमी भी इंडिगो के लिए बड़ी परेशानी बनती जा रही है। एयरबस से नए विमानों की आपूर्ति समय पर नहीं हो पा रही है, वहीं प्रैट एंड व्हिटनी इंजन में आई तकनीकी दिक्कतों के चलते 40 से अधिक विमान इस समय ग्राउंडेड हैं। हालात संभालने के लिए कंपनी ने 20 से ज्यादा किराये के विमान तो जरूर जोड़े हैं, लेकिन इनमें तैनात पायलट इंडिगो के सीधे नियंत्रण में नहीं होते, जिससे संचालन में अतिरिक्त जटिलताएं पैदा हो रही हैं और उड़ानों की नियमितता प्रभावित हो रही है।
भर्ती और ट्रेनिंग में सुस्ती भी जिम्मेदार
खर्च कम रखने की रणनीति के तहत इंडिगो ने पायलटों की भर्ती और ट्रेनिंग की रफ्तार धीमी कर दी। कंपनी का आकलन था कि छोटे शहरों में उड़ानें कम होने से पायलटों की जरूरत घटेगी, लेकिन बड़े शहरों में पहले से ही पायलट भारी दबाव में काम कर रहे थे। यही असंतुलन अब बड़े संकट के रूप में सामने आ गया।
यात्रियों की बढ़ी नाराजगी
लगातार कैंसिलेशन और देरी से यात्रियों का गुस्सा फूट पड़ा। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में यात्रियों ने इंडिगो के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराईं। कई यात्रियों ने रिफंड और वैकल्पिक उड़ानों को लेकर भी असंतोष जताया।
विशेषज्ञों का क्या मानना है?
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इंडिगो पायलटों की पर्याप्त भर्ती, ट्रेनिंग और फ्लीट मैनेजमेंट पर तेजी से काम नहीं करती, तब तक हालात पूरी तरह सामान्य होना मुश्किल है। वहीं DGCA की नजर भी एयरलाइन के संचालन पर लगातार बनी हुई है। कुल मिलाकर, देश की सबसे भरोसेमंद मानी जाने वाली एयरलाइन इंडिगो इस वक्त नियमों, संसाधनों की कमी और प्रबंधन की चूक के जाल में फंसती नजर आ रही है, जिसका सीधा खामियाजा यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है।




