नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। आज अष्टमी और नवमी के दिन माता रानीकी पूजा अर्चना के साथ ही कन्या पूजन भी किया जाता हैं और कन्या भी खिलाई जाती है। कन्या पूजन की ये परंपरा सदियों से चली आ रही है, लेकिन इसकी शुरुआत कैसे हुई और कन्या पूजन का महत्व क्या है, इसके बारे में आइए विस्तार से जानते हैं।
दूसरी प्रसिद्ध कथा
शास्त्रों के अनुसार के भी कहा जाट हैं कि , जब-जब धरती पर अधर्म और अत्याचार बढ़ा, तब देवी दुर्गा ने विभिन्न रूपों में अवतार लेकर दुष्ट शक्तियों का संहार किया। देवी के इन रूपों में बालिका रूप को सबसे पवित्र और शक्तिशाली माना गया है। कहा जाता है कि देवी ने कई बार कन्या के रूप में प्रकट होकर राक्षसों का विनाश किया।
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक बार एक दैत्य ने कठोर तपस्या कर वरदान प्राप्त किया कि उसे कोई पुरुष नहीं मार सकता। इसके बाद वह अत्याचार करने लगा। तब देवी ने एक छोटी कन्या का रूप धारण किया और उस दैत्य का वध किया। इस घटना के बाद कन्या को देवी का स्वरूप मानकर पूजने की परंपरा शुरू हुई।
कन्या पूजन का महत्त्व
नवरात्रि में माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है। पूजन में 9 कन्याओं को ही बुलाने की परंपरा है जिन्हें माता दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही एक बटुक भी कन्याओं के साथ होना चाहिए जो भैरव का रूप माना जाता है। जो भी भक्त विधि-विधान से माता की पूजा आराधना करते हैं और कुमारी कन्याओं का पूजन करते हैं उन्हें माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
यह परंपरा केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश भी देती है। यह हमें सिखाती है कि बेटियों का सम्मान करना चाहिए और उन्हें देवी का दर्जा देना चाहिए। इस लिए अष्टमी और नवमी के दिन लोग कन्या पूजन करते हैं।




