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Wednesday, April 1, 2026
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‘राज्य घाटे में, फिर भी बांट रहे मुफ्त रेवड़ियां’ फ्रीबीज कल्चर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से पहले बांटी जा रही मुफ्त योजनाओं को लेकर सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि ज्यादातर राज्य आर्थिक घाटे में चल रहे हैं, इसके बावजूद मुफ्त योजनाएं बांटी जा रही हैं।

नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से पहले बांटी जा रही मुफ्त योजनाओं (फ्रीबीज) को लेकर सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि ज्यादातर राज्य आर्थिक घाटे में चल रहे हैं, इसके बावजूद मुफ्त योजनाएं बांटी जा रही हैं, जिससे देश के आर्थिक विकास पर असर पड़ सकता है।

‘किस तरह की संस्कृति बना रहे हैं’

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल उठाया कि अगर सरकारें मुफ्त खाना, मुफ्त बिजली, मुफ्त साइकिल जैसी योजनाएं बिना किसी स्पष्ट नीति के बांटती रहेंगी, तो इससे किस तरह की कार्यसंस्कृति विकसित होगी? कोर्ट ने कहा कि जरूरतमंदों को सहायता देना राज्य का कर्तव्य है, लेकिन जो लोग भुगतान करने में सक्षम हैं और जो नहीं हैं, उनके बीच फर्क किए बिना सबको मुफ्त सुविधाएं देना उचित नहीं है।

‘विकास के लिए बजट क्यों नहीं?’

पीठ ने कहा कि राज्य अपने वार्षिक राजस्व का बड़ा हिस्सा विकास कार्यों में क्यों नहीं लगाते? यदि कोई योजना बेरोजगारी दूर करने या जीवन स्तर सुधारने के लिए है, तो उसका स्पष्ट बजट और योजना सामने आनी चाहिए। न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने भी कहा कि यह मुद्दा किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी राज्यों से जुड़ा है। यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉरपोरेशन लिमिटेड ने मुफ्त बिजली देने के प्रस्ताव से जुड़े नियम को चुनौती दी है। कोर्ट ने पूछा कि बिजली दरें तय होने के बाद सभी उपभोक्ताओं को मुफ्त बिजली देने का फैसला क्यों किया गया?

‘रोजगार पर दें जोर’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यों को मुफ्त योजनाएं बांटने के बजाय रोजगार के अवसर बढ़ाने और दीर्घकालिक विकास योजनाओं पर ध्यान देना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर लगातार मुफ्त सुविधाएं दी जाएंगी, तो काम करने की संस्कृति पर भी असर पड़ सकता है। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है। अगली सुनवाई में इस पर विस्तार से चर्चा होगी। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दे दिया है कि ‘फ्रीबी कल्चर’ पर दोबारा गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

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