नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क । सनातन परंपरा में एकादशी व्रत को सभी व्रतों से बड़ा और खास माना जाता है। खासकर फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष में आने वाली आमलकी एकादशी, जिसे रंगभरी एकादशी भी कहा जाता है, भगवान विष्णु की विशेष पूजा और तप का अवसर मानी जाती है। हिंदू धर्म के अनुसार इस व्रत को करने से जीवन में आने वाले दुख और बाधाएं दूर होती हैं और भगवान विष्णु की कृपा से सभी सुखों की प्राप्ति होती है। आमलकी एकादशी का नाम आंवले के पेड़ से जुड़ा है, जिसे व्रत के दिन विशेष महत्व दिया जाता है। इस व्रत के दिन पूजा, जप और तप के साथ-साथ पारण का समय भी शुभ माना जाता है। सही तारीख और मुहूर्त के अनुसार व्रत करने से इसका पुण्य और भी बढ़ जाता है। चलिए इसके बारे में विस्तार से बताते हैं।
शुभ मुहूर्त और पारण का समय
फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की एकादशी, यानी आमलकी एकादशी 2026, 27 फरवरी, शुक्रवार को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार यह व्रत 27 फरवरी 2026 पूर्वाह्न 00:33 बजे से प्रारंभ होकर रात्रि 10:32 बजे तक रहेगा। व्रत का पारण अगले दिन, 28 फरवरी 2026, शनिवार, को किया जा सकता है। इस दिन पारण करने का शुभ समय प्रात:काल 06:47 बजे से 09:06 बजे तक है। इस समय व्रत पूर्ण करते हुए भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और व्रत का पुण्य बढ़ता है।
व्रत की विधि और पूजा का तरीका
आमलकी एकादशी के दिन व्रत रखने वाले को सलाह दी जाती है कि वह सुबह सूर्योदय से पहले उठ जाए और साफ-सुथरे कपड़े पहनकर स्नान कर ले। यदि संभव हो तो हल्के पीले रंग के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। इसके बाद सूरज को जल अर्पित करना चाहिए और अपने मन में यह संकल्प करना चाहिए कि वह भगवान विष्णु की कृपा के लिए इस पवित्र व्रत को पूरी श्रद्धा और विधि के साथ निभाएगा।
पूजा का स्थान अगर आंवले के पेड़ के पास हो तो सबसे उत्तम है, लेकिन यदि ऐसा संभव न हो तो घर के पूजा स्थल में भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र को गंगा जल से पवित्र करके पूजा की जा सकती है। मूर्ति के अभिषेक के लिए शंख में केसर मिलाकर दूध और जल का प्रयोग करना चाहिए, इसके बाद चंदन, पुष्प, दीपक और फल अर्पित किए जाते हैं। इस दिन आंवले का फल अर्पित करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
पूजा के दौरान आमलकी एकादशी की कथा सुनना या पढ़ना व्रत का पुण्य बढ़ाता है, और मंत्रों का जाप करके आरती करना इसे पूर्णता प्रदान करता है। हिंदू मान्यता के अनुसार, एकादशी का व्रत तभी सम्पूर्ण माना जाता है जब इसका पारण सही समय पर किया जाए। इसलिए अगले दिन, शुभ मुहूर्त में भगवान को भोग अर्पित करने के बाद ही पारण करना चाहिए, जिससे व्रत का पुण्य पूर्ण रूप से प्राप्त होता है।
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी मुख्य रूप से सामान्य धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। हम इसकी सटीकता की पुष्टि नहीं करते हैं।





