नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। देश की सबसे समृद्ध नगर निकाय बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) में सत्ता को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। खासतौर पर मुंबई के मेयर पद को लेकर महायुति के भीतर खींचतान अब खुलकर सामने आ गई है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी है तो दूसरी ओर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना। दोनों ही दल इस अहम पद पर अपना-अपना दावा ठोक रहे हैं। मेयर पद केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि बीएमसी जैसे ताकतवर प्रशासनिक ढांचे की कमान संभालने का केंद्र बिंदु माना जाता है। ऐसे में यह मुकाबला राजनीतिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ गया है।
दिल्ली बैठक से बढ़ी सियासी सरगर्मी
मेयर पद को लेकर चल रही रस्साकशी के बीच दिल्ली में हुई बैठकों ने सियासी माहौल और गर्म कर दिया है। शिवसेना के पूर्व सांसद राहुल शेवाले ने देर रात बीजेपी नेताओं के साथ बीएमसी को लेकर चर्चा की। उनकी बीजेपी नेता अमित साटम के साथ हुई संक्षिप्त लेकिन अहम बैठक को राजनीतिक गलियारों में काफी मायने रखकर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इस दौरान न सिर्फ मेयर पद, बल्कि बीएमसी की वैधानिक समितियों-जैसे स्थायी समिति और शिक्षा समिति-के बंटवारे पर भी बातचीत हुई। हालांकि बैठक के बाद आधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं आया, लेकिन संकेत साफ हैं कि फैसला अब शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर होगा
सीटें कम, फिर भी शिवसेना का दावा मजबूत
बीएमसी चुनाव में शिवसेना को बीजेपी के मुकाबले कम सीटें मिली हैं, इसके बावजूद वह मेयर पद पर मजबूती से दावा कर रही है। शिवसेना का तर्क है कि मुंबई उसकी पारंपरिक राजनीतिक कर्मभूमि रही है और दशकों से उसने बीएमसी के प्रशासन को संभाला है। पार्टी का कहना है कि नगर निगम चलाने का अनुभव, स्थानीय नेतृत्व और संगठनात्मक पकड़ को देखते हुए मेयर पद शिवसेना के पास रहना चाहिए। शिंदे गुट यह भी संकेत दे रहा है कि मेयर पद छोड़ना उसके कोर वोट बैंक पर असर डाल सकता है।
बीजेपी का तर्क: सबसे बड़ी पार्टी, इसलिए पहला हक
दूसरी ओर बीजेपी इस बार मुंबई में इतिहास रचने के मूड में है। पार्टी का कहना है कि बीएमसी चुनाव में उसे सबसे ज्यादा 89 सीटें मिली हैं, जबकि शिवसेना को 29 सीटों पर संतोष करना पड़ा। ऐसे में स्वाभाविक तौर पर मेयर पद पर पहला अधिकार बीजेपी का बनता है। महायुति के पास कुल मिलाकर 118 सीटें हैं, जो बहुमत के आंकड़े 114 से ज्यादा हैं। अब सवाल यही है कि गठबंधन की मजबूती के लिए कौन सा दल पीछे हटेगा, या फिर कोई बीच का रास्ता निकाला जाएगा। राजनीतिक संकेतों के मुताबिक, अंतिम फैसला जल्द ही महाराष्ट्र और दिल्ली स्तर पर होने वाली उच्चस्तरीय बैठक में तय हो सकता है।





