नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। जातीय हिंसा से जूझ चुके मणिपुर में अब एक बार फिर संवाद की गुंजाइश बढ़ने वाली है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत 20 से 22 नवंबर तक राज्य के तीन दिवसीय दौरे पर रहेंगे। दो साल पहले भड़की हिंसा के बाद यह उनका पहला मणिपुर दौरा है। संघ की ओर से इसे शताब्दी वर्ष से जुड़े कार्यक्रमों का हिस्सा बताया गया है, लेकिन इस यात्रा को लेकर राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में खासा उत्साह है।
प्रमुख नागरिकों, जनजातीय नेताओं और युवाओं से संवाद
संघ के मणिपुर सह-सरकार्यवाह तरुण कुमार शर्मा ने बताया कि, सरसंघचालक इस दौरान समाज के प्रमुख नागरिकों उद्यमियों आदिवासी जनजातियों के प्रतिनिधियोंऔर युवा नेतृत्व से अलग-अलग सत्रों में मुलाक़ात और संवाद करेंगे। उद्देश्य है। समाज के विभिन्न वर्गों के बीच आपसी समझ और विश्वास को मजबूत करना।
इंफाल में विशेष कार्यक्रम, पहाड़ी इलाकों में भी पहुंच
भागवत 20 नवंबर को गुवाहाटी से इंफाल पहुंचेंगे। उसी दिन इंफाल के कोंजेंग लेइकाई में उनका एक विशेष संवाद कार्यक्रम निर्धारित है, जहां वह उद्यमियों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों से मुलाक़ात करेंगे। 21 नवंबर को वे मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले विभिन्न आदिवासी समुदायों के नेताओं के साथ बैठक करेंगे।हालांकि, यह साफ किया गया है कि राहत शिविरों का दौरा फिलहाल कार्यक्रम में शामिल नहीं है, क्योंकि यह यात्रा मुख्यत: संगठन के आंतरिक कार्यक्रमों से जुड़ी है।
हिंसा की पृष्ठभूमि—260 से ज्यादा लोगों की मौत
मणिपुर मई 2023 में भड़की जातीय हिंसा से अब तक उबर नहीं पाया है। मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच हुई इस हिंसा में 260 से अधिक लोगों की मौत हुई जहां हज़ारों लोग अपने घरों से विस्थापित हो गए। हिंसा के बाद हालात बिगड़ने पर राज्य सरकार अस्थिर हुई, और इसके बाद केंद्र ने राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। विधानसभा का कार्यकाल भले ही 2027 तक हो, लेकिन वर्तमान में उसे निलंबित रखा गया है।
भागवत का पुराना संदेश-शांति को प्राथमिकता
हिंसा के बाद राज्य पर मोहन भागवत पहले भी चिंता जता चुके हैं। 10 जून 2024 को लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद उन्होंने कहा था, मणिपुर 10 साल तक शांत था, बंदूक संस्कृति खत्म होती दिख रही थी। लेकिन आज भड़की आग को बुझाने के लिए कौन आगे आएगा? शांति को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी ही होगी।उनके इस दौरे को उसी शांति संदेश के अगले कदम के रूप में देखा जा रहा है। बता दे कि, मणिपुर में मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच चल रहे संघर्ष की जड़ें कई दशकों पुरानी हैं और यह भूमि, संसाधन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पहचान जैसे जटिल ऐतिहासिक और सामाजिक-आर्थिक कारकों से जुड़ी हुई हैं।यह संघर्ष केवल हाल ही की घटना नहीं है, बल्कि पहाड़ी और घाटी के बीच की पुरानी जातीय दरार को दर्शाता है। यहां संघर्ष के मुख्य ऐतिहासिक और वर्तमान कारण दिए गए हैं।
मणिपुर संघर्ष के मुख्य ऐतिहासिक और वर्तमान कारण
1. भूमि और आरक्षण का विवाद यह वर्तमान संघर्ष का मुख्य तात्कालिक कारण है।
मैंतेई की एसटी दर्जे की मांग: इम्फाल घाटीमें रहने वाला मैतेई समुदाय लंबे समय से अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग कर रहा है। उनकी मांग है कि 1949 में भारत में विलय से पहले उन्हें जनजातीय माना जाता था और उन्हें यह दर्जा अपनी सांस्कृतिक पहचान और पुश्तैनी ज़मीन को बाहरी लोगों से बचाने के लिए चाहिए।
कुकी-ज़ो का विरोध: पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले कुकी-ज़ो (आदिवासी) समुदाय इस मांग का कड़ा विरोध करते हैं। उनका डर यह है कि अगर मैतेई को एसटी का दर्जा मिल गया, तो वे पहाड़ी क्षेत्रों में ज़मीन खरीद सकेंगे (जो अभी जनजातियों के लिए आरक्षित है)। चूंकि मैतेई समुदाय सामाजिक और आर्थिक रूप से अधिक मजबूत है, कुकी-ज़ो को डर है कि वे नौकरियों और संसाधनों में भी अधिक लाभ उठा लेंगे।
भौगोलिक असमानता: मणिपुर का केवल 10% भूभाग घाटी में आता है (जहाँ मैतेई बहुसंख्यक हैं), जबकि 90% भूभाग पहाड़ी है (जहाँ कुकी और नागा जनजातियाँ रहती हैं)। वर्तमान कानून मैतेई को पहाड़ों में ज़मीन खरीदने से रोकता है, लेकिन पहाड़ी जनजातियों को घाटी में ज़मीन खरीदने की अनुमति है। मैतेई इसे असमानता मानते हैं।
2. अवैध आप्रवासन और जनसांख्यिकीय परिवर्तन
म्यांमार से घुसपैठ: मैतेई समुदाय का दावा है कि पड़ोसी देश म्यांमार से कुकी-ज़ोमी समुदाय के लोगों का अवैध आप्रवासन बढ़ रहा है। जहां मैतेई मानते हैं कि इस अवैध घुसपैठ के कारण राज्य की जनसांख्यिकी बदल रही है, जिससे वे अपनी ही घाटी में धीरे-धीरे हाशिए पर आ सकते हैं। कुकी-ज़ोमी समुदाय के लोग इस आरोप को उनके समुदाय को विस्थापित करने का एक बहाना मानते हैं।
3. ड्रग्स के विरुद्ध सरकारी अभियान
पोस्त की खेती (Poppy Cultivation): मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह (जो स्वयं मैतेई हैं) ने राज्य में नशीली दवाओं (ड्रग्स) के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है। इस अभियान में अफीम के खेतों को नष्ट किया गया है, जिसका आरोप है कि यह अवैध खेती पहाड़ी क्षेत्रों में कुकी समुदाय के गरीब ग्रामीणों द्वारा अधिक आय के लिए की जाती है।कुकी-ज़ो समुदाय इस अभियान को अपनी आजीविका छीनने और उन्हें उनके गाँवों से उखाड़ फेंकने की साजिश मानते हैं।
4. ऐतिहासिक जातीय तनाव और राजनीतिक प्रतिनिधित्व
औपनिवेशिक विभाजन: ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन ने ‘बांटो और राज करो’ की नीति के तहत पहाड़ी और घाटी क्षेत्रों के बीच विभाजन को बढ़ावा दिया, जिससे समुदायों के बीच ऐतिहासिक तनाव गहराया।
पुराना संघर्ष 1990 के दशक में भी कुकी और नागा समुदायों के बीच ज़मीन और संसाधनों को लेकर भयंकर हिंसक संघर्ष हो चुका है।इम्फाल घाटी (मैतेई बहुल) में अधिक आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचा निवेश हुआ है, जबकि पहाड़ी क्षेत्र विकास में पिछड़े रहे हैं। इस असमानता ने पहाड़ी जनजातियों में हाशिए पर महसूस करने की भावना को जन्म दिया है।
यह संघर्ष केवल आरक्षण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भूमि स्वामित्व, राजनीतिक स्वायत्तता की मांग, संसाधनों पर नियंत्रण और ऐतिहासिक पहचान जैसे कई जटिल मुद्दों का परिणाम है।





