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बीएचयू ने मिर्ज़ापुर के 2700 एकड़ सूखाग्रस्त क्षेत्र को बनाया जल संसाधन में आत्मनिर्भर

नई दिल्ली, 18 मार्च (आईएएनएस)। देश में जहां अनेक प्राकृतिक जल भंडार हैं, वहीं देश के कुछ भाग जल प्रचुरता के मामले में उतने संपन्न नहीं हैं। उत्तर प्रदेश का मिजार्पुर जि़ला भी ऐसे ही भागों में से है, जिसे देश के सात सर्वाधिक सूखाग्रस्त क्षेत्रों में गिना जाता है। इस सब के बावजूद लगभग 2700 एकड़ भूमि को बीएचयू ने जल के मामले में आत्मनिर्भर बना लिया है। मिर्ज़ापुर में केवल 40 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि है जिसमें सिंचाई की कोई निश्चित व्यवस्था नहीं है। इसलिए, किसानों को शुष्क भूमि और वर्षा आधारित सीमित फसलों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। जिले में मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा बहुत कम है। क्षेत्र का बड़ा हिस्सा पथरीला और उबड़-खाबड़ होने के कारण भूमिगत जल संसाधन अनिश्चित, अप्रत्याशित है और संभावित कृषि उत्पादन हेतु अप्रयुक्त हैं। अनियमित वर्षा वितरण, व्यापक कटाव, भू-क्षरण, पोषक तत्वों की कमी और कृषि योग्य भूमि का जलमग्न होना अनेक समस्याएं हैं, जो खेती को भी काफी चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। यहां मृदा में जल धारण क्षमता भी सीमित है। बीएचयू के प्रोफेसर वी. के. मिश्रा ने बताया कि इन तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद लगभग 2700 एकड़ में फैले बीएचयू के विशाल दक्षिणी परिसर ने जल के मामले में स्वयं को आत्मनिर्भर बना लिया है। आज जब वैश्विक समुदाय जल संचयन एवं संरक्षण के लिए तमाम प्रयास, ऊर्जा एवं संसाधन लगा रहा है, ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि पृथ्वी पर हर व्यक्ति को पीने योग्य पानी मिले, दक्षिणी परिसर ने अनुकरणीय कार्य कर दिखाया है। परिसर में अपनी खुद की जल प्रबंधन व आपूर्ति व्यवस्था स्थापित की गई है। इसके अलावा कृषि व पशुधन संबंधी आवश्यकताओं के लिए वर्षा जल संचयन की संरचनाएं निर्मित की गई हैं। कृषि-पारिस्थितिकीय रूप से यहां दो प्रमुख स्थितियां हैं सिंधु-गंगा का मैदान (30-40 फीसदी) और विंध्य क्षेत्र (शेष क्षेत्र)। विंध्य क्षेत्र में जल संसाधन बहुत कम हैं और भूमि ज्यादातर परती है। ऐसे क्षेत्र में एक विशाल विश्वविद्यालय के बड़े परिसर को चलाना अत्यंत चुनौतीपूर्ण है, जिसमें हजारों छात्र, शिक्षक एवं कर्मचारियों को रहना हो, कृषि इकाईयां हों तथा पशुधन हो। वाराणसी शहर से 70 किमी और विन्ध्यांचन पर्वत श्रंखला के मिजार्पुर से बाहर रॉबर्ट्सगंज मार्ग पर लगभग 12 किमी दूर स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का राजीव गांधी दक्षिणी परिसर पूर्वी विंध्य क्षेत्र के पठारों पर स्थित है, और अपनी स्थापना के समय जल को लेकर तमाम चुनौतियों का सामना कर रहा था। मिर्ज़ापुर को उत्तर प्रदेश के पिछड़े क्षेत्रों में भी माना जाता है। यहीं के बरकछा में स्थापित दक्षिणी परिसर में जल की व्यवस्था तथा जल प्रबंधन तंत्र स्थापित करना विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए मुख्य प्राथमिकता था। विश्वविद्यालय के वरिष्ठ सदस्य अब भी उन प्रारंभिक दिनों को याद करते हैं जब वे बरकछा परिसर जाते समय दिन भर के लिए पानी बीएचयू के वाराणसी स्थित कैंपस से ही ले जाया करते थे। दक्षिणी परिसर में वर्षा के पानी को संग्रह करने के लिए कुल 9 चेक डैम, 2 अपवाह जल संग्रहण तालाब और 3 कुएं हैं। प्रत्येक चेक डैम में 2 लाख लीटर तक पानी जमा हो सकता है। चेक डैम के पानी का उपयोग दक्षिणी परिसर के कृषि क्षेत्रों में सिंचाई के लिए किया जाता है। वर्तमान में लगभग 40 हेक्टेयर भूमि पर चेक डैम में एकत्रित पानी का उपयोग करके खेती की जा रही है। दक्षिणी परिसर के कृषि फार्म में खरीफ के दौरान विभिन्न फसलें जैसे धान, तिल, बाजरा, मक्का, अरहर, मूंग और उड़द की फसलें उगाई जाती हैं, जबकि रबी के मौसम में गेहूं, जौ, मसूर, चना, सरसों मुख्य फसलें होती हैं। चेक डैम का उपयोग मत्स्य पालन के लिए भी किया जा रहा है। इनके अलावा एक बड़ा तालाब है जिसमें पानी का भंडारण क्षेत्र 100 मीटर गुणा 100 मीटर है जिसकी औसत गहराई 3-4 मीटर और दो अपवाह जल संग्रह बांध है। ये बांध और तालाब सिंचाई के लिए जुलाई से दिसंबर तक अल्पावधि के लिए पानी जमा करते हैं। विभिन्न कुओं के पानी का उपयोग परिसर क्षेत्र में बागवानी और वृक्षारोपण के विकास के लिए किया जाता है। दक्षिणी परिसर में पीने के पानी की आवश्यकता की पूर्ति हेतु, निचले खजूरी बांध के जल को पंप किया जाता है। ये बांध दक्षिणी परिसर से तकरीबन 2.5 किलोमीटर दूरी पर स्थित है, जहां विश्वविद्यालय ने पंपिंग इकाई निर्मित कराई है। इस पंपिंग इकाई से विश्वविद्यालय में बनाई गई फिल्टरेशन इकाई में पानी लाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के तहत करीब 12-13 लाख लीटर पानी पंप कर यहां लाया जाता है, जिसका शोधन कर गुणवत्तायुक्त बनाकर पीने के लिए आपूर्ति की जाती है। साफ किए हुए पानी के भंडारण के लिए 5 लाख लीटर की क्षमता वाले दो जल संग्रहण टैंक स्थापित किए गए हैं। वाटर फिल्टर यूनिट से पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान संकाय परिसर तक प्राकृतिक पानी की पाइपलाइन स्थापित की गई है। अशोधित प्राकृतिक जल का उपयोग मवेशियों और अन्य पशुशालाओं के रखरखाव के लिए किया जाता है। इसके अलावा बेल, कस्टर्ड सेब, करोंदा और अमरूद के बागों को प्राकृतिक जल उपलब्ध कराया जाता है जिससे कृषि फार्म को अतिरिक्त आय होती है। लगभग 04 हेक्टेयर क्षेत्र में औषधीय फसल लेमन ग्रास की खेती की गई है जिसे पंपिंग हाउस के प्राकृतिक जल से भी सिंचित किया जाता है। –आईएएनएस जीसीबी/आरजेएस

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