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इतिहास में है ऐसे घपलों की नींव !

डॉ. प्रभात ओझा मुंबई पुलिस कमिश्नर पद से होमगार्ड में भेज दिए गए आईपीएस अफसर परमवीर सिंह ने महाराष्ट्र के अपने मंत्री पर ही भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। एक मातहत निर्वाचित नेता पर आरोप लगाए, यह बात जितनी गंभीरता से ली जानी चाहिए, अब वैसा होता नहीं। वे दौर हवा हो गए जब मातहतों की लापरवाही मात्र से मंत्री इस्तीफा दे दिया करते थे। ऐसा पहला उदाहरण तत्कालीन रेलमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का है, जो बाद में देश के प्रधानमंत्री भी बने थे। साल 1956 में तमिलनाडु के अरियालुर में एक भीषण ट्रेन दुर्घटना में 142 लोगों की मौत हो गई थी। जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में रेलमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने हादसे की नैतिक जिम्मेदारी ली और अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इस घटना के 43 साल बाद भी 1999 में गैसाल ट्रेन हादसे में 290 लोग मारे गए। तब के रेलमंत्री नीतीश कुमार ने भी अपना पद छोड़ दिया था। तब वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे। अलग बात है कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के रेलमंत्री नीतीश कुमार की तरह उसी सरकार की रेलमंत्री ममता बनर्जी के कार्यकाल में भी दो रेल हादसे हुए। तब ममता के इस्तीफा देने पर वाजपेयी ने उसे स्वीकार नहीं किया। शायद ये तर्क रहे हों कि छोटी दुर्घटनाएं होती रहती हैं। शायद यह भी कि मातहतों के कारण एक ही विभाग में मंत्री का इस्तीफा बार-बार क्यों हो। सम्भवतः इसी आधार पर बाद में सुरेश प्रभु ने हादसों की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए जब इस्तीफा दिया, स्वीकार नहीं हुआ।जो भी हो, ये मामले सिर्फ मातहतों के कारण नैतिक जिम्मेदारी लेने के ही हैं। अब तो मातहत ये आरोप लगा रहे हैं कि मंत्री धन वसूली के लिए अपने अधीनस्थों पर दबाव बनाते हैं। मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमवीर सिंह ने राज्य के गृहमंत्री अनिल देशमुख पर इसी तरह के आरोप लगाए हैं। ऐसा नहीं कि मंत्रियों पर लगे आर्थिक भ्रष्टाचार को हमेशा अनदेखा किया गया हो। साल 1958 में हरिदास मूंदड़ा ने सरकार में अपने रसूख के बल पर अपनी कंपनियों के शेयर एलआईसी को भारी दाम पर खरीदने को मजबूर किया था। इससे एलआईसी को बड़ा झटका लगा। आरोप वित्तमंत्री टीटी कृष्णामचारी पर भी लगे और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके विपरीत पंडित नेहरू के ही प्रधानमंत्री रहते जीप घोटाले की अनदेखी ने भ्रष्टाचार को दबाने अथवा आरोप लगाने वालों की परवाह न करने की परंपरा डाल दी। वीके कृष्ण मेनन इसके पहले उदाहरण हैं। वे ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त थे। भारतीय सेना के लिए ब्रिटेन से जीपों की खरीद हुई। कृष्ण मेनन ने समझौते पर खुद हस्ताक्षर किए थे। जीपों के भारत पहुंचने पर उन्हें काम के लायक ही नहीं समझा गया। विपक्ष ने संसद में हंगामा किया, पर नेहरू नहीं माने। कांग्रेस ने ललकारा कि विपक्ष चाहे तो इसे अगले चुनाव में इसे मुद्दा बना ले। बात इतनी ही नहीं रही। कृष्ण मेनन बाद में देश के रक्षामंत्री भी बनाए गए। अलग बात है चीन के साथ लड़ाई में देश की हार के बाद उन्हें रक्षामंत्री का पद छोड़ना पड़ा, पर एक ही साथ वे नैतिकता और भ्रष्टाचार का उदाहरण बन गए। नेहरू के ही समय पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। जांच कराई गई। अजीब परिणाम सामने आया कि कैरो की पत्नी और बेटे ने धन लिए। इसमें कैरो का कोई हाथ नहीं है। पंडित नेहरू को लगा था कि पंजाब में अकालियों से निपटने में कैरो ही सक्षम हैं। राजनीतिक मजबूरी में भ्रष्टाचार के लोकाचार बन जाने के और भी उदाहरण हैं। एक दौर आया कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘करप्सन’ को ‘वर्ल्ड फेनोमेना’ ही मान लिया। राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते माना कि वे केंद्र से जो एक रुपया भेजते हैं, उसमें सिर्फ 15 पैसे ही उन तक पहुंचते हैं, जिनके लिए भेजे जाते हैं। आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जरूर दावा करते हैं कि ‘डिजिटल एज’ में सबकुछ खुला है और लोगों तक मदद जनधन खातों के जरिए पूरा के पूरे पहुंच जाते हैं। माना कि केंद्र में बैठे लोगों पर संस्थागत घोटाले के आरोप नहीं हैं, पर देश से यह खत्म हो गया, इसका दावा भी नहीं कर सकते। भ्रष्टाचार के संस्थागत उदाहरण कांग्रेस के ही दौर में हों, ऐसा नहीं है। कांग्रेस की कारस्तानियों के खिलाफ जेपी के नेतृत्व में लड़ने वाले भी घिरे हुए हैं। लालू प्रसाद यादव इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। बिहार में नई सरकार के बनते ही एक ही दिन बाद शिक्षा मंत्री मेवालाल को अपना पद छोड़ना पड़ा। मेवालाल पर कुलपति रहते अध्यापकों और जूनियर वैज्ञानिकों की नियुक्ति में अनियमितता के आरोप थे और जांच चल रही थी। इसके पहले नीतीश कुमार मंत्रिमंडल से ही जीतनराम मांझी पर आरोप लगे थे और उन्हें पद छोड़ना पड़ा था। देश का शायद ही कोई प्रदेश हो, जहां मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे हों, पर इस्तीफा हर बार नहीं हुआ। सम्भव है कि महाराष्ट्र की महाविकास अघाड़ी सरकार के गृहमंत्री अनिल देशमुख के मामले में भी कोई उदाहरण अलग तरह का नहीं बन सके। सवाल तो यह कि मुबई जैसे देश के बड़े शहर में हजारों रेस्टोरेंट और बार आदि से धन उगाही के आरोप वाले संस्थागत मामलों का खात्मा कब होगा। आरोप सच साबित होंगे, उम्मीद कम ही है। आखिर संस्थागत भ्रष्टाचार में राजनेताओं के साथ अफसर भी तो होते हैं। जो भी हो, नजरें इसबार महाराष्ट्र की तरफ हैं। (लेखक, हिन्दुस्थान समाचार के न्यूज एडिटर हैं।)

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