नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती 9 अक्टूबर को लखनऊ में कांशीराम की पुण्यतिथि पर ऐतिहासिक मेगा रैली करने जा रही हैं। चार साल के लंबे अंतराल के बाद हो रही इस रैली को लेकर न सिर्फ बसपा कार्यकर्ता उत्साहित हैं, बल्कि विरोधी दलों में खलबली भी मची हुई है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से लेकर भीम आर्मी तक, सभी इस रैली की काट खोजने में जुटे हैं।
जीवन-मरण की लड़ाई लड़ रही बीएसपी
2027 का विधानसभा चुनाव मायावती के लिए सिर्फ एक और चुनाव नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक अस्तित्व की निर्णायक परीक्षा है। 2022 में केवल एक सीट जीतने वाली बीएसपी 2024 के लोकसभा चुनाव में खाता तक नहीं खोल सकी। ऐसे में 9 अक्टूबर की रैली को बसपा ने अपनी ‘शक्ति-प्रदर्शन’ की आखिरी बड़ी कोशिश के रूप में देखा है। पार्टी का मकसद साफ है दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक वोट बैंक को फिर से अपने पक्ष में लामबंद करना।
सपा और कांग्रेस क्यों हो गए हैं बेचैन?
सवाल उठता है जब विरोधी दल बीएसपी को खत्म मान चुके थे, तो अब अचानक उनकी पेशानी पर बल क्यों है?दरअसल, इस रैली से ठीक पहले बीएसपी का सोशल मीडिया अभियान तेज हुआ है। बीएसपी का कोर वोट बैंक, दलित समुदाय, जो पिछले वर्षों में भाजपा और सपा की ओर खिसका था, उसे वापस लाने की जद्दोजहद में मायावती ने पूरी ताकत झोंक दी है। यही वो वजह है कि अखिलेश यादव और राहुल गांधी की टीमों में हलचल है।
रैली से पहले अखिलेश का ‘डैमेज कंट्रोल’
मायावती की रैली के ठीक एक दिन पहले अखिलेश यादव का आज़म खान के घर जाना भी सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। माना जा रहा है कि सपा नेतृत्व को आशंका है कि आज़म खान बसपा का रुख न कर लें। यही कारण है कि उन्हें मनाने की मुहिम चल रही है।
दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर सपा समर्थकों ने बसपा को “बीजेपी की बी-टीम” करार देना शुरू कर दिया है। कांग्रेस भी इसी लाइन पर है। पूर्व सांसद उदित राज ने मायावती पर “कमल को दिल में रखने” का आरोप लगाया और उन्हें ‘दलित आंदोलन को कमजोर करने वाली’ बताया।
भीम आर्मी भी मैदान में, लेकिन किसके खिलाफ?
चंद्रशेखर आज़ाद की आजाद समाज पार्टी ने भी कांशीराम की पुण्यतिथि पर हर जिले में आयोजन की घोषणा की है। यानी साफ है कि ‘बहुजन वोट बैंक’ के लिए ज़मीन पर लड़ाई अब आर-पार की होती दिख रही है।
क्या बीएसपी की रैली से टूटेगा PDA फॉर्मूला?
सपा ने 2024 में PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फार्मूला तैयार किया था, लेकिन अगर बीएसपी दलित और मुस्लिम वोटरों में फिर से पैठ बना लेती है, तो अखिलेश की रणनीति धराशायी हो सकती है। खासकर पश्चिमी यूपी में सपा का वोट शेयर प्रभावित हो सकता है।
SP-BSP गतिरोध और 2022 के परिणाम
बता दे, साल 2019 में सपा-बीएसपी के गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में काफी सीटें जीती थीं (15 सीटें), लेकिन बाद में गठबंधन टूट गया। इससे बीएसपी ने अकेले चुनाव लड़ा और सपा के वोट बैंक को नुकसान पहुंचाया, जिसका नकारात्मक प्रभाव 2022 के चुनावों में दिखा। इस कारण सपा चिंतित है कि 2027 में बीएसपी फिर से अकेले लड़कर त्रिकोणीय मुकाबला बना सकती है, जो सपा के लिए सीटों की कमी का कारण बनेगा।
बीएसपी की नई रणनीति
बीएसपी अब मुस्लिम नेताओं को अपनी रैली में शामिल कर रही है, जिससे सपा के लगभग 19% मुस्लिम वोट बैंक पर असर पड़ सकता है। खासकर पश्चिमी यूपी में जहां मुस्लिम-दलित गठजोड़ पर बीएसपी जोर दे रही है, वहां सपा की पकड़ कमजोर हो सकती है। यह रणनीति बीएसपी को फिर से मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
कांग्रेस की चिंता
कांग्रेस, जो इंडिया गठबंधन का हिस्सा है, को भी डर है कि बीएसपी की यह सक्रियता उनके दलित और गठबंधन आधार को प्रभावित कर सकती है। राहुल गांधी के बयान से यह साफ है कि कांग्रेस भी मायावती के साथ गठबंधन चाहती है, लेकिन मायावती की गैर-गठबंधन नीति और उनकी रैलियां कांग्रेस के लिए चुनौती बन रही हैं।
राजनीतिक बयानबाजी और प्रचार
कांग्रेस समर्थक बीएसपी को भाजपा की “बी-टीम” बताकर प्रचार कर रहे हैं, यह बीएसपी की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न लगाने का प्रयास है। यह दिखाता है कि कांग्रेस को बीएसपी के बढ़ते प्रभाव से बेचैनी है और वे अपने विरोधियों को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।
कांग्रेस की चिंता मायावती?
कांग्रेस को भी चिंता है कि मायावती का यह शक्ति प्रदर्शन उन्हें फिर से “स्वतंत्र राजनीतिक ताकत” बना देगा। राहुल गांधी ने हाल ही में कहा था कि मायावती साथ होतीं तो भाजपा की सरकार न बनती। पर मायावती लगातार गठबंधन से दूरी बनाकर कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ा रही हैं।
क्या मायावती फिर से बनेंगी ‘किंगमेकर’?
9 अक्टूबर की रैली में मायावती अपने भतीजे आकाश आनंद को दोबारा लॉन्च कर सकती हैं। साथ ही दलित-मुस्लिम गठजोड़ की नई पटकथा भी पेश की जा सकती है। माना जा रहा है कि यदि यह रैली सफल होती है, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में यूपी की राजनीति त्रिकोणीय संघर्ष की ओर बढ़ेगी।जिसमें न सपा अकेली ताकत होगी, न कांग्रेस, और न ही भाजपा की राह इतनी आसान होगी।
9 अक्टूबर की यह रैली बीएसपी के लिए सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सत्ता में वापसी की दहलीज है। और यही कारण है कि विरोधी दलों की बेचैनी बढ़ना स्वाभाविक है। अब देखना यह है कि ‘हाथी’ की यह हुंकार सिर्फ शोर बनकर रह जाती है या फिर वाकई में यूपी की राजनीति को नया मोड़ देती है।




