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एकल विद्यालय अभियान : जहां न पहुँचे रवि, वहां भी पहुँचे कवि की हो रही कहावत चरितार्थ

06/05/2021 गुना 06 मई (हि.स.) । जहां न पहुँचे रवि, वहां भी पहुंचे कवि की कहावत को चरितार्थ करने में लगे हुए है एकल विद्यालय। दरअसल उन दूरस्थ से दूरस्थ क्षेत्रों में जहां सरकारी योजनाएं तो छोडि़ए, मूलभूत सुविधाएं भी बमुश्किल मिल पाती हैं, वहां भी एकल विद्यालय संचालित हो रहे है और इन विद्यालयों में अपवाद छोड़क़र नियमित आचार्य भी सेवाएं दे रहे हैं। इन विद्यालयों का उद्देश्य वनवासियों के बीच सेवा कार्य करने के साथ ही उन्हें उनकी संस्कृति से जोड़े रखना भी है। हालांकि वर्तमान में कोरोना संक्रमण के कारण यह विद्यालय बंद है, किन्तू सेवा कार्य.यथावत चल रहे हैं। स्वाभाविक रुप से यह सेवा कार्य फिलहाल कोरोना संक्रमण से ही जुड़े है। जिनमें चिकित्सा सेवा, मास्क वितरण, कोरोना के प्रति जागरुकता जगाने, कोरोना कर्फ्यू का पालन कराना प्रमुख है। अभियान के मध्य भारत भाग प्रभारी महेश सिंह सोलंकी के मुताबिक वनबंधु किसी भी क्षेत्र में निवास करने वाले सबसे प्राचीन रहवासी होते है। ये अपने साथ समेटे होते हैं उस धरा का इतिहास। स्वाभाविक है इनकी अपनी जीवन शैली में लोकाचार, लोक कला, लोक संगीत, लोक नृत्य आदि शामिल होते हैं। समय के साथ ये सभी विघटित हो रहे हैं। इन को यदि संपूर्णता के साथ संरक्षित नहीं किया गया तो ये धीरे -धीरे आधुनिक जीवन शैली में शामिल होकर या धर्मांतरण के कारण समाप्त हो जाएंगे। ऐसा नहीं होने पाए, इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एकल विद्यालय वन बंधु परिषद के माध्यम से कार्य कर रहा है। सोलंकी का मानना है कि आज आवश्यकता इस बात की है कि ग्रामीण क्षेत्र से निकलकर एक संभ्रांत जीवन शहर में व्यतीत करने वाले लोगों को अपनी जड़ों की ओर वापस लौटना चाहिए और मेरा गांव मेरी जिम्मेदारी इस अभियान में शामिल होकर एकल अभियान को तन मन और धन से सहयोग करना चाहिए। तभी अभियान का उद्देश्य पूरा हो सकेगा। एकल विद्यालय यानि प्राथमिक शिक्षा केन्द्र एक विद्यालय यानि एक व्यक्ति द्वारा एक गांव में संचालित होने बाला एक प्राथमिक शिक्षा केन्द्र, जो इनकी संस्कृति को संरक्षण के लिए कार्य करता है। इस विद्यालय का एक आचार्य पूरे गांव के 5 से 15 साल तक के बच्चों को गांव के किसी छाया-दार पेड़ के नीचे या किसी उपयुक्त स्थान पर एकत्रित कर प्राथमिक शिक्षा देने का कार्य करता है । एकल अभियान में इस विद्यालय को अंचल के रुप में विभाजित किया गया है। जिसमें राजगढ़ और बदरवास को जोडक़र एक अंचल बना है। जिसमें मुंगावली और अशोकनगर को भी शामिल किया गया है। सोलंकी के मुताबिक अंचल में 410 विद्यालय संचालित हो रहे हैं। एक विद्यालय में एक आचार्य ही सेवा देते हैं। इसलिए इन्हें एकल विद्यालय का नाम दिया गया है। गुना अंचल में लगभग 12500 बच्चे एकल विद्यालय में पढ़ते हैं। 450 सोखता गड्डो का निर्माण, 52 हजार से ज्यादा पौधे रोंपे एकल विद्यालय में बच्चों को सिर्फ शिक्षा और संस्कार प्रदान नहीं किए जाते हैं, बल्कि उनका सर्वागीण विकास के साथ ही स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रदान की जाती हैं। इतना ही नहीं, अन्य सेवा कार्य भी किए जाते हैं, जिनमें स्वच्छता, सरकारी योजनाओं की जानकारी देना, जैविक खेती के लिए प्रेरित करना आदि कार्य भी आचार्य करते हैं। इसके लिए गांवों में सोखता गड्डा, कचरा गड्डा, पोषण वाटिका व पौधारोपण का कार्य कराया जाता है। सोलंकी ने बताया कि अंचल में अभी तक 450 सोखता गड्डों का निर्माण किया जा चुका है। पोषण वाटिका के अंतर्गत ग्रामीणों को अपने घर व खेत में जैविक खाद से सब्जियों के उत्पादन के लिए प्रेरित किया जाता है। साथ ही किसान को जैविक खाद कैसे बनाई जाए? इसकी पूरी जानकारी एकल विद्यालय की ओर से दी जाती है। पर्यावरण संरक्षण के अतंर्गत पिछले दो सालों में 52 हजार से अधिक पौधे अंचल में लगाए जा चुके हैं। कोरोना काल में भी चल रहे सेवा कार्य वर्तमान में जब कोरोना संक्रमण के कारण एकल विद्यालयों का संचालन बंद है, तब भी सेवा कार्य नियमित रूप से चल रहे हैं, बल्कि इन्हें और गति प्रदान की गई है। प्रत्येक एकल ग्राम में आचार्य द्वारा ग्रामवासियो को सामाजिक दूरी, साबुन से हाथ धोना व क्वारंटाइन होने का महत्व समझाया गया। इसके साथ ही मास्क वितरण भी किया जा रहा है, वहीं कोरोना कर्फ्यू का सख्ती से पालन भी ग्रामीणों के सहयोग से आचार्य करा रहे हैं। गांवों में मुख्य प्रवेश द्वार पर बैरिकेड्स लगाकर बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश को चिन्हित किया जा रहा है । साथ ही जागरुकता संदेश भी प्रसारित किए जा रहे हैं। भारत के साथ नेपाल में भी चल रहे एकल विद्यालय एकल विद्यालय की स्थापना 1989 में ओडिशा के गुमला जिले में हुई थी। प्रारम्भ में 78 ग्रामकेन्द्रों पर इस योजना का शुभारम्भ किया गया। जिसका उद्देश्य था आदिवासी भील भिलाला व जनजातीय क्षेत्र में शिक्षा का विस्तार करना, उनके स्वास्थ्य का ख्याल रखना एवं उनकी संस्कृति को संरक्षित रखना। आज पूरे भारत एवं नेपाल में श्याम गुप्त के कुशल मार्गदर्शन में एक लाख से अधिक ग्राम केंद्रों पर योजना कार्य कर रही है। हिन्दुस्थान समाचार / अभिषेक

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