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Monday, March 23, 2026
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आखिरी अशरे की फजीलत पहले दो अशरों से कहीं ज्यादा बरकत देना वाला : मुफ्ती असदुद्दीन कासमी

– रब का जिक्र, कुरआन की तिलावत, ईबादत, तौबा व इस्तेगफार और रो-रोकर अल्लाह से दुआ मांगने में गुजारने की जरूरत है कानपुर, 05 मई (हि.स.)। रमजान मुबारक का आखिरी अशरा शुरू हो चुका है। तमाम अहले ईमान को अपने दूसरे कामों में कमी करके ज्यादा से ज्यादा वक्त अल्लाह का जिक्र, कुरआन की तिलावत, ईबादत, तौबा व इस्तेगफार और रो-रोकर अल्लाह से दुआ मांगने में गुजारने की जरूरत है। यह नेकी कमाने वाले मौसम—ए—बहार के आखिर बचे हुए दिन हैं। यू तो रमजान मुबारक का पूरा महीना नेकियों का मौसम—ए—बहार है। लेकिन इसके आखिरी अशरे की फजीलत पहले दो अशरों से कहीं ज्यादा है। इसमें अल्लाह तआला की रहमतें, बरकतें और उसकी इनायतें पहले से ज्यादा बन्दों की तरफ आकर्षित होती हैं। यह बातें मस्जिद मुहम्मदी दरगाह शरीफ के इमाम व खतीब मुफ्ती असदुद्दीन कासमी ने कही। उन्होंने बताया कि, अल्लाह के रसूल सल्लाहु अलैहि वसल्लम रमजान के इस आखिरी अशरे में इबादत का खास एहतमाम फरमाते थे, रिवायत में आता है कि जब रमजान का आखिरी अशरा आता था तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इबादत के लिये कमर कस लेते थे। खुद भी रातों को जाग कर अल्लाह की इबादत में व्यस्त रहते और अपने परिजनों को भी जगाने का काम करते थे। अहले ईमान को इन मुबारक लम्हों की कद्र करते हुए अल्लाह की तरफ उनका ध्यान आकर्षित करने और अपने गुनाहों से तौबा करके अपने खालिक व मालिक को मनाकर राजी करने की जरूरत है। मुफ्ती कासमी ने बताया कि इस वक्त हम जिन हालात से गुजर हैं और जिस महामारी ने हम सबको हिलाकर रख दिया है। इसमें कोई शक नहीं कि यह सब हमारे खराब कर्मों का नतीजा और गुनाहों की सजा है। लिहाजा तमाम अहले ईमान को बहुत ज्यादा तौबा और इस्तेगफार की तरफ ध्यान लगाने की जरूरत है। दुनिया के मामूली से फायदे के लिये हम ना जाने कितनी रातें जाग कर गुजार देते हैं तो क्या अल्लाह को राजी करने के लिये हम एक अशरा यानि 10 दिन भी नहीं निकाल सकते हैं। कुल हिन्द इस्लामिक इल्मी अकादमी कानपुर की अल-शरिया हेल्पलाइन से पूछे गए प्रश्नों के उत्तर प्रश्न:-मोतकिफ (ऐतिकाफकर्ता) को किन-किन कारणों से मस्जिद से निकलने की इजाजत है? उत्तर:- निम्न कारणों से मोतकिफ (ऐतिकाफकर्ता) को मस्जिद से निकलने की इजाजत होगी। पहला शारीरिक ज़रूरत जैसे मल-मूत्र या अगर मस्जिद तक खाना लाने वाला कोई नहीं है तो खाने के लिये मस्जिद से निकलने की इजाज़त है। दूसरा शरई जरूरत जैसे जिस मस्जिद में मोतकिफ है वहां जुमे की नमाज नहीं होती तो जुमे के लिये जामा मस्जिद जाना, इसी तरह स्नाना और वुजू करने के लिये मस्जिद से बाहर निकलने की इजाजत होगी। तीसरा अगर मस्जिद किसी वजह से टूट जाये या मस्जिद में रहने के दौरान अपनी जान का खतरा हो तो ऐसी सूरतों में मोतकिफ के लिये मस्जिद से बाहर निकलना जायज होगा। प्रश्न:-कोविड वैक्सीन के लिये मस्जिद से बाहर निकलना मोतकिफ के लिये जायज है या नहीं? उत्तर:- कोविड वैक्सीन ऐहतियाती उपाय के तौर पर पहले से लगवाई जाती है और ऐतिकाफ खत्म होने के बाद भी लगवाई जा सकत है, लिहाजा कोविड वैक्सीन लगवाने के लिये मोतकिफ को मस्जिद से बाहर निकलने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। प्रश्न :- फितराना कब देना चाहिए? और अगर ईद से पहले या आखिरी अशरे में दे दिया जाये तो क्या हुक्म है ? उत्तर:- सद्क़ा ए फित्र ईदुल फित्र के दिन जिस वक़्त फज्र का वक्त आता है (यानि जब सेहरी का वक़्त खत्म होता है) उस वक़्त वाजिब होता है, अलबत्ता सदका—ए—फित्र ईद से पहले रमजान में भी किसी भी दिन अदा करना दुरूस्त है, सहाबा ए किराम से रमजान में सदका—ए—फित्र की अदायगी साबित है, लिहाजा रमजान के आखिरी अशरे में सदका—ए—फित्र अदा करना दुरूस्त है। लेकिन ईदुल फित्र के दिन ईद की नमाज से पहले-पहले सदका—ए—फित्र अदा कर लेना चाहिए, यह बहुत ज्यादा फजीलत की बात है, ईद की नमाज से पहले अदा नहीं किया तो नमाज के बाद अदा करना होगा, लेकिन इससे सवाब में कमी होगी और ईद के दिन ज्यादादा देर करना सुन्नत के विरूद्ध और मकरूह है, लेकिन फिर भी अदा करना ज़रूरी होगा। प्रश्न:- फिद्या और सदका—ए—फित्र की रकम किसको दी जा सकती है ? उत्तर:- फिद्या और सदका—ए—फित्र की रकम उन्हीं को दी जा सकती है जिनको जकात दी जा सकती है, यानि मुसलमान फकीर जो सैयद और हाशमी ना हो और उसकी मिल्कियत में जरूरत से ज़्यादा इतना माल या सामान ना हो जिसकी कीमत साढ़े बावन तोला चांदी की क़ीमत तक पहुंचे। प्रश्न:- क्या मैं अपने भाई को सदका फित्र दे सकता हूं ? उत्तर:- अगर आपका भाई जकात लेने का अर्ह है तो उसे आप सदका-ए-फित्र दे सकते हैं। अर्ह होने का मतलब यह है कि उनके पास साढे़ सात तोला सोना या साढ़े बावन तोला चांदी या जरूरत व इस्तेमाल से ज्यादा की मालियत का किसी किस्म का माल या सामान मौजूद ना हो। हिन्दुस्थान समाचार/ महमूद

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