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औषधीय पौधे उत्तराखंड की बदल सकते हैं आर्थिक तकदीरः डा. रावल

नैनीताल, 07 मार्च (हि.स.)। गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण संस्थान कोसी कटारमल के निदेशक डा. आरएस रावल का कहना है कि औषधीय पौधे उत्तराखंड एवं हिमालयी क्षेत्र की आर्थिक तकदीर बदल सकते हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि पहाड़ के जिन बिखरे हुए खेतों में वर्ष भर मेहनत कर मुट्ठी भर अनाज उत्पन्न नहीं हो पाता, उनमें सैकड़ों से हजारों रुपये प्रति किलोग्राम की दर बिकने वाली की औषधियां उगाई जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिए जैव विविधता के संरक्षण के लिए मनःस्थिति को बदलने की आवश्यकता है। केवल पौधों का दोहन करने पर रोक लगाने से पौधों का संरक्षण नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए संरक्षित किए जाने वाले पौधों की मानव के लिए उपयोगिता को बढ़ाये जाने की सोच विकसित करने की आवश्यकता है। मनुष्य केवल उसी को बचाता है जो उसके लिए उपयोगी होता है। उन्होंने कहा कि पहाड़ की बिखरी हुई खेती जहां परंपरागत खेती से क्षेत्रवासियों का भरण-पोषण नहीं हो पा रहा है, ऐसे में यदि उन्हें औषधीय पौधों की खेती करना सिखाया जाए और उनके उत्पादों की ‘एमएसपी’ घोषित हो व पूरे दाम मिलें तो इससे उत्तराखंड ही नहीं पूरे हिमालयी क्षेत्र की आर्थिक तकदीर बदल सकती है। शनिवार को कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान डॉ. रावल ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों के पास न केवल औषधीय पौधों, वरन इनके औषधीय गुणों के बारे में भी पारंपारिक ज्ञान का भंडार है। अभी दवा कंपनियां व लोग केवल जंगलों में उगने वाले औषधीय पौधों पर निर्भर हैं और उनका दोहन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शोध संस्थाओं के लिए केवल पौधों में औषधीय गुणों की खोज करने के साथ ही उनकी मात्रा एवं खेतों में उत्पादन का भी पता लगाने, सरकार की ओर से क्षेत्रीय लोगों को औषधीय पौधों की पौध उपलब्ध कराने सहित अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने व उन्हें खरीदने के लिए एमएसपी घोषित करने तथा दवा कंपनियों की ओर से प्रयोग किये जा रहे पारंपारिक ज्ञान का लाभ उस ज्ञान के मूल स्रोतों को भी पहुंचाने व ग्रामीणों को औषधीय पौधों के उत्पादन में मदद करने की आवश्यकता है। हिमालयी क्षेत्रों में औषधीय पौधों से आजीविका की अपार संभावना डा. रावल ने बताया कि दुनिया में पायी जाने वाली कुल वनस्पतियों में से केवल 17.8 फीसद और भारत में पाई जाई जाने वाली कुल वनस्पतियों की 44 फीसद व उत्तराखंड में पाई जाने वाली कुल वनस्पतियों की कुल 22 फीसद वनस्पतियों में औषधीय गुणों की पहचान हुई है। हर पौधे में कुछ न कुछ औषधीय गुण जरूर होते हैं। इसका अर्थ यह है कि शेष सभी पौधों में औषधीय गुणों का अध्ययन भी किया जाना शेष है। वहीं हिमालयी क्षेत्र में पाये जाने वाले 1748 प्रजातियों के पौधों में 542 प्रजातियां मूलतः यहीं के पौधे हैं और इनमें से 15.4 फीसद पौधे केवल यहीं मिलते हैं। यदि इन 15.4 फीसद पौधों के औषधीय गुणों का उपयोग कर लिया जाए तो इनके अध्ययन में ‘ग्लोबल लीडर’ बना जा सकता है। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि बड़ी फार्मा कंपनियां अभी केवल 10 फीसद पौधों का ही उपयोग कर रही हैं। साफ है कि इस क्षेत्र में कार्य करने की अपार संभावनाएं हैं। चिंताजनक तथ्य वक्ताओं ने कहा कि देश-दुनिया में जहां जनसंख्या का बढ़ना चिंता का विषय है, वहीं उत्तराखंड सहित हिमालयी क्षेत्रों में जनसंख्या का घटना चिंता का विषय है। यहां केवल 20 फीसद क्षेत्रफल में ही अधिक जनसंख्या निवास करती है जबकि शेष 80 फीसद क्षेत्रफल की जनसंख्या नगण्य है। वहीं 1991 से 2001 के बीच यहां हुई जनसंख्या वृद्धि 21.3 फीसद के सापेक्ष 2001-11 के बीच केवल 17.3 फीसद फीसद की वृद्धि हुई है। यहां चिंताजनक है। दूसरी ओर पिछले 10 वर्षों में शहरीकरण देश के 31.8 फीसद से कहीं अधिक पूरे हिमालयी क्षेत्रों में 48.4 फीसद व उत्तराखंड में 42 फीसद की दर से बढ़ा है। इस कारण ही उत्तराखंड के कुल 16793 गांवों में से 1053 यानी 9 फीसद गांव भुतहा यानी जनसंख्या शून्य हो चुके हैं, जबकि अन्य 405 गांवों में 10 से कम लोग निवास कर रहे हैं। हिन्दुस्थान समाचार/डॉ.नवीन जोशी/मुकुंद

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