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Monday, April 6, 2026
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Mahatma Gandhi Birth Anniversary: सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी और रुस्तम की दोस्ती के किस्से

Happy Gandhi Jayanti 2024: आज महात्मा गांधी की 155वीं जयंती मनाई जा रही है। वैसे तो गांधी जी के बहुत से किस्से है मगर आज हम आपको उनका और रुस्तम का किस्सा बताएंगे जो शायद ही आपने सुना होगा।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। Happy Gandhi Jayanti 2024: सत्य और अहिंसा का था वो पुजारी, कभी ना जिसने हिम्मत हारी, सांस दी हमें आजादी की, जन-जन जिसका है बलिहारी। 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी धूम-धाम से मनाई जाती है। साल 2024 में उनकी 155वीं जयंती मनाई जा रही है। ऐसे में हम आपको महात्मा गांधी के जीवन से जुड़े कुछ दिलचस्प किसे बताएंगे। जिन्हें शायद आप जानते भी नहीं होंगे, लेकिन उससे पहले महात्मा गांधी के बारे में संक्षिप्त परिचय आपको देते हैं।

महात्मा गांधी का संक्षिप्त परिचय

महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। उनका पूरा नाम मोहन दास करमचंद गांधी था। इनके पिता जी का नाम करमचंद गांधी था और वो पंसारी जाति से संबंध रखते थे। महात्मा गांधी की 13 साल की उम्र में कस्तूरबा गांधी के साथ शादी हो गई थी।

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन से की थी कानून की पढ़ाई 

गांधी जी की शुरुआती पढ़ाई पोरबंदर, राजकोट और भावनगर में हुई। इसके बाद उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन से कानून की पढ़ाई की। थोड़े समय तक मुम्बई और राजकोट में वकील के रूप में काम करने के बाद वे एक भारतीय फर्म के साथ अनुबंध पर वकालत करने दक्षिण अफ्रीका गए। उस समय दक्षिण अफ्रीका भी अंग्रेजी साम्राज्य का हिस्सा था।

दक्षिण अफ्रीका में भेदभाव का सामना

दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए गांधी जी को भारतीयों के खिलाफ भेदभाव का सामना करना पड़ा। एक बार उनकी प्रथम श्रेणी की रेल टिकट होने के बावजूद उन्हें ट्रेन से बाहर निकाल दिया गया। ऐसे कई अनुभवों ने उन्हें अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भूमिका

साल 1915 में गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट आए और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सक्रिय हो गए। उन्होंने स्वराज (स्वतंत्रता) की बात खुलकर रखी। उन्हें चम्पारण और खेड़ा सत्याग्रह में प्रमुखता मिली, जब उन्होंने छोटे किसानों के अधिकारों के लिए अंग्रेजों के खिलाफ सत्याग्रह किया। इसके बाद अंग्रेज सरकार को छोटे किसानों से राजस्व वसूलने का आदेश वापस लेना पड़ा।

असहयोग आंदोलन की शुरुआत

1 अगस्त 1920 को गांधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन को गाँव के किसानों से लेकर शहरों के लोगों ने समर्थन दिया। इसके तहत लोगों ने सरकारी स्कूल, कॉलेज, दफ्तर और न्यायालयों का बहिष्कार किया। लेकिन आंदोलनकारियों ने 1922 में गोरखपुर के चौरी चौरा में एक घटना में किसानों ने पुलिस थाने को आग लगा दी। इस पर गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को वापस लेने का निर्णय लिया क्योंकि वे हिंसा को बढ़ावा नहीं देना चाहते थे।

भारत छोड़ो आंदोलन

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, 8 अगस्त 1942 को गांधी जी ने “भारत छोड़ो आंदोलन” की घोषणा की जो जल्द ही एक जन आंदोलन बन गया। इस आंदोलन के चलते गांधी जी और कई युवाओं को जेल में डाल दिया गया।

15 अगस्त 1947 का दिन

जून 1944 में जब विश्व युद्ध समाप्ति के करीब था तो गांधी जी को जेल से रिहा किया गया। फरवरी 1947 में लॉर्ड माउंट बेटन को वायसराय नियुक्त किया गया, जिन्होंने भारतियों को सत्ता हस्तांतरण की घोषणा की। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और लोग खुशी से जश्न मनाने लगे।

महात्मा गांधी की मृत्यु

जब 15 अगस्त को देश भर में जश्न मनाया जा रहा था, गांधी जी कलकत्ता में थे। वे हिन्दू-मुस्लिम बंटवारे और हिंसा से दुखी थे। 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में एक प्रार्थना सभा के दौरान नाथूराम गोडसे ने गांधी जी को गोली मार दी। उनके आखिरी शब्द “हे राम” थे।

गांधी जी और रुस्तम की दोस्ती

रुस्तम गांधी जी के एक निकटतम मित्र थे, जो एक व्यापारी थे। वे गांधी जी के मुवक्किल भी थे। रुस्तम व्यापार में चुंगी फीस की चोरी करते थे, लेकिन उन्होंने यह बात गांधी जी से छुपाई। जब उनकी चोरी पकड़ी गई और उन्हें जेल जाने की नौबत आ गई तो उन्होंने मदद के लिए गांधी जी से संपर्क किया। गांधी जी चोरी की इस बात पर बहुत नाराज हुए और इस केस में कोई मदद करने से इंकार कर दिया। गांधी जी ने उन्हें सच्चाई बताने की सलाह दी। रुस्तम ने उनकी सलाह मानकर चुंगी अधिकारी के पास जाकर सब कुछ सच-सच बता दिया। अधिकारी उनकी ईमानदारी से प्रभावित होकर उन्हें छोड़ दिया। इस अनुभव ने रुस्तम को सिखाया कि आगे से वह किसी भी प्रकार की चोरी नहीं करेंगे। तो इस प्रकार गांधी ने न केवल अपने बल्कि समाज सुधारने और समाज के कामों में अपना बहुत योगदान दिया है।

महात्मा गांधी के रेलगाड़ी का सफर

एक बार गांधी जी चम्पारण से बतिया जा रहे थे। रेलगाड़ी में बहुत कम लोग थे और कई सीटें खाली थीं। गांधी जी एक सीट पर लेट गए। जब अगले स्टेशन पर गाड़ी रुकी, तो एक किसान गाड़ी में चढ़ा। उसने गांधी जी को लेटा देखकर गुस्से में कहा, “उठो, क्यों पसरे पड़े हो? यह सोने की सीट नहीं है!” गांधी जी चुपचाप उठकर दूसरी ओर बैठ गए।

जब बतिया स्टेशन आया, गांधी जी उतरने लगे। किसान भी उनके पीछे था। किसान ने देखा कि स्टेशन पर बहुत भीड़ थी, लोग फूल और मालाएं लिए खड़े थे। जैसे ही गांधी जी उतरे, सभी लोग उनके पास आ गए। किसान को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिस व्यक्ति को उसने डांटा था, वह महात्मा गांधी थे।

किसान तुरंत उनके पांवों में गिर गया और माफी मांगी। गांधी जी ने उसे गले लगाते हुए कहा, “आपने मुझे एक बहुत बड़ी सीख दी है कि मुफ्त की चीज का गलत इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।”

गांधी जी को सबसे पहले ‘राष्ट्रपिता’ कहकर संबोधित करने वाले सुभाष चन्द्र बोस थे। 4 जून 1944 को सिंगापुर से एक रेडियो संदेश में उन्होंने गांधी जी को राष्ट्रपिता कहा। गांधी जी को ‘महात्मा’ की उपाधि नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ ठाकुर ने दी थी।

15 अगस्त, 1947 को गांधी जी बंगाल के नोआखली में थे। इस दिन उन्होंने 24 घंटे का उपवास रखा, क्योंकि देश को आजादी तो मिली थी, लेकिन बंटवारे के कारण हिन्दू-मुस्लिम के बीच काफी दंगे हुए थे, जिससे गांधी जी बहुत दुखी थे। 

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