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Tuesday, April 7, 2026
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Sardar Beant Singh: पंजाब में अलगाववाद पर ब्रेक लगाने वाले मुख्यमंत्री, आज के दिन ही बम विस्फोट में हुई थी मौत

आज से 29 साल पहले 1995 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की बम विस्फोट में मौत हो गई थी। उन्होंने सूझबूछ से पंजाब में अलगाववाद को रोकने का सफल प्रयास किया था।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। साल था 1995 और तारीख थी 31 अगस्त। रोज की तरह उस दिन भी चंडीगढ़ के सीएम दफ्तर में चहल-पहल थी। तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री सरदार बेअंत सिंह रोजाना की तरह उस दिन भी सचिवालय में काम कर रहे थे। उनकी बुलेट प्रूफ कार पोर्टिको में लग चुकी थी। वो किसी दस्तावेज पर दस्तखत करने के लिए बाहर जाने की तैयारी करते हैं। इसकी सूचना उनके सिक्योरिटी इंचार्ज को दी जाती है। सूचना मिलते ही कमांडो की भीड़ उनके लिए सुरक्षा घेरा बना लेते हैं और उन्हें लेकर ऑफिस से बाहर निकलते हैं। जैसे ही बेअंत सिंह अपनी बुलेट प्रूफ कार में बैठने की कोशिश करते हैं, तभी तेज धमाका होता है और चारों तरफ आग और धुएं का गुबार फैल जाता है। जब ये गुबार छंटता है तब वहां का नजारा जिसने भी देखा वो दंग रह गया। पूरा सचिवालय परिसर खून से रंग गया होता है और वहां मौजूद लोगों के जिस्म के चीथड़े बिखरे पड़े होते हैं। इस धमाके में पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के साथ कुल 17 लोगों की मौत हो चुकी थी। इस दुस्साहसिक वारदात को पंजाब पुलिस के एक कर्मी दिलावर सिंह बब्बर ने अंजाम दिया था। दिलावर सिंह ने अपने ऊपर बंधे बम में विस्फोट कर पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह व अन्य की जान ले ली थी।

क्यों हुई बेअंत सिंह की हत्या ?

31 अक्टूबर 1984 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में सिख विरोधी दंगे हुए। जिसमें करीब 3340 सिख मारे गए। 1990 के दशक में देश में खूनी हिंसा का एक चक्र छिड़ गया था। जिसमें सिख आतंकवादियों ने पंजाब में भयंकर कत्लेआम मचाया था। आतंकियों ने पंजाब पुलिस के कई कर्मियों और अधिकारियों की हत्या कर दी थी। ये हत्याएं सिखों की हत्याओं में पुलिस अधिकारियों की कथित भूमिका के प्रतिशोध के रूप में की गई थी।

पंजाब में बढ़ते उग्रवाद को देखते हुए केंद्र सरकार ने 1987 से 1992 तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था। जब 1992 में पंजाब में विधानसभा चुनाव हुए तो सिर्फ 24 फीसदी मतदाताओं ने ही मतों का प्रयोग किया। कहा जाता है कि भय के कारण लोग वोट देने के लिए घरों से बाहर नहीं निकले। इस चुनाव के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह बने। उन्होंने प्रशासनिक सूझबूझ और लोगों को भरोसे में लेकर पंजाब में शांति लाने के लिए कार्रवाई करने लगे। उनके शासनकाल में पंजाब आतंकवाद से सामान्य स्थिति की ओर बढ़ने लगा।

बेअंत सिंह ने क्या किया था ?

मुख्यमंत्री बनते ही बेअंत सिंह ने राज्य से आतंकवादियों के खात्मे के लिए एक बड़ा अभियान छेड़ दिया। उन्होंने तत्कालीन DGP KPS गिल को पूरी छूट दे दी थी। जिसके बाद गिल ने आतंकवादियों के खिलाफ वो अभियान चलाया जिसकी आज भी सराहना की जाती है। उन्होंने ऑपरेशन चलाकर कई बड़े अलगाववादी आतंकियों का सफाया कर दिया। उनके डर से पंजाब से बड़ी संख्या में अलगाववादी देश छोड़कर अमेरिका, कनाडा, यूके और अन्य जगहों पर चले गए। इसका प्रतिशोध लेने के लिए वधाव सिंह के नेतृत्व वाले बब्बर खालसा इंटरनेशनल संगठन ने इंग्लैंड में मुख्यमंत्री बेअंत सिंह को खत्म करने की साजिश रची।

पंजाब में चढ़ा था अलगाववाद का नशा

उन दिनों पंजाब अलगाववाद की आग में जल रहा था। पुलिस और प्रशासन के लोग दो धड़ों में बंटे हुए होते हैं। बेअंत सिंह सीएम के रूप में काफी सख्त इंसान थे। वे अलगाववाद के घोर विरोधी थे। उन्होंने पंजाब में अलगाववाद को काबू करने के लिए जनता को भरोसे में लेकर काफी हद तक पंजाब में आतंकी गतिविधियों को रोकने में कामयाब हुए थे। वो जीवन के अंतिम क्षण तक इसी काम में लगे रहे। बात में जांच के दौरान ये पता लगा कि अलगाववादियों ने बेअंत सिंह को मारने के लिए एक बैकअप प्लान के रूप में दूसरा मानव बम को भी वहां पर रखा था। टास्क पूरा होने के बाद वो मौके से निकल गया। बाद में पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। उस व्यक्ति की पहचान बलवंत सिंह राजोआन के रूप में हुई। वो आज भी जेल में बंद है। अदालत ने उसे फांसी की सजा सुनाई थी।

सेना छोड़कर राजनीति में की थी एंट्री

सरदार बेअंत सिंह का जन्म 1922 में हुआ था। उन्होंने स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद सेना में जाकर देश सेवा करने का निर्णय लिया। उसके बाद वो सेना में भर्ती हो गए। जल्द ही उनका मन सेना से हट गया और वो जमीन पर उतरकर देश और समाज की सेवा करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सेना छोड़कर राजनीति में कदम रख दिया। उनकी राजनीतिक यात्रा जमीन से शुरू हुई। 1960 में वे बिलासपुर गांव के सरपंच, फिर ब्लॉक समिति के चेयरमैन चुने गए। फिर वो लुधियाना में सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के निदेशक बने। इस तरह से वो धीरे-धीरे राजनीतिक सीढ़ियां चढ़ते हुए पहली बार 1969 में निर्दलीय विधायक के रूप में विधानसभा पहुंचे। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वो 5 बार MLA बने और बाद में पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष बने।

जगतार सिंह तारा था इस हमले का मास्टरमाइंड

पंजाब के मुख्यमंत्री की हत्या के बाद पुलिस ने इस वारदात को अंजाम देने वाले अलगाववादियों की खोज तेज कर दी। पुलिस ने जांच के दौरान बलवंत सिंह राजोआना को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के मुताबिक इस हमले का मास्टरमाइंड जगतार सिंह तारा था, जो खालिस्तानी टाइगर फोर्स का कमांडर था। 12 साल चले मुकदमे के बाद 31 जुलाई 2007 को कोर्ट ने इस मामले में बलवंत सिंह राजोआना, जगतार सिंह को मौत की सजा सुनाई और 4 अन्य लोगों को 10 साल की सजा सुनाई। हालांकि बाद में हाईकोर्ट ने जगतार सिंह की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दी, लेकिन बलवंत सिंह को कोई राहत नहीं दी गई। इस समय भी बलवंत सिंह जेल की कोठरी में अपने दिन गिन रहा है। 

राजोआना के लिए पंजाब में चलते हैं कैंपेन

साल 2012 में सरकार ने राजोआना की फांसी की सजा पर रोक लगा दी। इस बर्बर और रक्तरंजित वारदात के 29 सालों बाद भी राजोआना जेल में रहकर भी काफी प्रभावी है। उसके लिए पंजाब में कैंपेन चलाए जाते हैं, सीएम का राष्ट्रपति से मलना और शिरोमणि गुरुद्वारा कमेटी की ओर से दया याचिका दाखिल करना इस बात के सबूत हैं कि राजोआना का आज भी पंजाब में वैसा ही प्रभाव है। जैसा 90 के दशक में था।

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