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Friday, March 20, 2026
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Jagdalpur: श्रीजगन्नाथ मंदिर में भगवान शालीग्राम के साथ तुलसी का आज होगा श्रीशुभ विवाह

Jagdalpur: 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष ईश्वर खंबारी ने बताया कि बस्तर गोंचा पर्व के परायण के दूसरे दिन देवशयनी एकादशी तिथि के बाद सभी मांगलिक कार्य पर विराम लग गया था।

जगदलपुर, हि.स.। 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष ईश्वर खंबारी ने बताया कि बस्तर गोंचा पर्व के परायण के दूसरे दिन देवशयनी एकादशी तिथि के बाद सभी मांगलिक कार्य पर विराम लग गया था। आज देवउठनी एकादशी के शुभ दिवस पर विधिवत भगवान विष्णु की पूजा अनुष्ठान संपन्न कर आज के बाद सभी मांगलिक कार्य किये जा सकेंगे।

प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी आज श्रीजगन्नाथ मंदिर में 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के द्वारा भगवान शालीग्राम के साथ तुलसी का विवाह संपन्न किया जायेगा। इसके लिए भगवान शालीग्राम को श्रीजगन्नाथ मंदिर में स्थापित किया जायेगा, जिसके साथ ही भगवान शालीग्राम-तुलसी विवाह शुरू हो जायेगा।

शुभ मुहर्त में भगवान शालीग्राम का श्रीशुभ तुलसी विवाह संपन्न किया जायेगा

ईश्वर खंबारी ने बताया कि परंपरानुसार प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के सदस्यों की उपस्थिति में आज सुबह 7 बजे से समस्त रस्म के निर्वहन के साथ देर शाम शुभ मुहर्त में भगवान शालीग्राम का श्रीशुभ तुलसी विवाह संपन्न किया जायेगा। तय कार्यक्रम के अनुसार वर पक्ष परमानंद पाढ़ी गुनपुर एवं वधू पक्ष अश्वनि पांडे गुनपुर के द्वारा भगवान शालीग्राम का श्रीशुभ तुलसी विवाह के सभी रस्मों का निर्वहन किया जायेगा।

श्रद्धालु भगवान शालीग्राम-श्रीशुभ तुलसी के विवाह में होंगे शामिल

परंपरानुसार भगवान शालीग्राम की बारात श्रीजगन्नाथ मंदिर से डोली-पालकी में निकलकर रथ परिक्रमा स्थल गोलबाजार चौक, दंतेश्वरी मंदिर चौक से होकर वापस जगन्नाथ मंदिर पहुंचकर परंपरानुसार पाणिग्रहण संपन्न होगा, इस शुभ अवसर पर समस्त श्रद्धालु भगवान शालीग्राम-श्रीशुभ तुलसी के विवाह में शामिल होकर पुण्य लाभ प्राप्त करें।

भगवान विष्णु का क्षीर सागर में शयनकाल समाप्त होता है

देव उठनी एकादशी के पावन अवसर पर आज नगर के रियासत कालीन श्रीजगन्नाथ मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। मंदिर में पहुंचे श्रद्धालुओं ने दीपाराधना के साथ ही गन्ने व कंद का अर्पण किया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु योग निद्रा से बाहर आते हैं और सृष्टि का पालनहार का दायित्व संभालते हैं। इसी के साथ भगवान विष्णु का क्षीर सागर में शयनकाल समाप्त होता है।

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