बलिया, 12 मई (हि.स.)। कोरोना की दूसरी लहर में संक्रमण गांव-गांव तक पहुंच चुका है। ऐसे में बलिया के डॉक्टर जेपी शुक्ला कोरोना मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभरे हैं। उनके अनुसार होम आइसोलेशन में आत्मबल से कोरोना को हराया जा सकता है। मरीज का आत्मबल सबसे बड़ा हथियार है। बुधवार को ‘हिन्दुस्थान समाचार’ ने उनसे खास बातचीत की। कोरोना संक्रमित मरीज इलाज के लिए दर-दर भटक रहे हैं। हालांकि, बलिया में शारदा हॉस्पिटल के संचालक राष्ट्रीय चिकित्सा रत्न और विष विशारद अवार्ड से सम्मानित डॉ. जेपी शुक्ल अपने अस्पताल के चेम्बर से निकल कर सड़क पर वाहन में पड़े मरीज को भी देखते हैं। मरीज की सुविधानुसार खुद ही दौड़ते नजर आते हैं। इससे कोरोना संक्रमितों को काफी राहत मिली है। रोजाना उनके यहां सैकड़ों मरीज इस आस में पहुंचते हैं कि जान बच जाएगी। डॉ. शुक्ला ने बताया कि अब तक मेरे पास करीब तीन हजार ऐसे मरीज आए, जिनका ऑक्सीजन स्तर कम था। उन्हें सांस लेने में कठिनाई हो रही थी। इसमें कई मरीजों के तो कोविड टेस्ट तक नहीं होते। मैं इन्हें कोरोना मरीज मानकर ही उपचार आरम्भ करता हूं। डॉ. शुक्ल बताते हैं कि लगभग सभी मरीजों को मैं दवा देकर घर जाने की सलाह देता हूं। साथ ही अपनी बातों से उनके अंदर आत्मबल पैदा करने की कोशिश करता हूं। मेरे मरीज अपने घर चले जाते हैं। उसके बाद उनसे फोन पर लगातार संपर्क में रहता हूं। डॉ. जेपी शुक्ल के कुछ मरीजों ने भी माना कि डॉक्टर साहब का यह कहना कि घबराओ नहीं मैं हूं न, यह किसी भी दवा से बढ़कर था। सोहांव ब्लॉक के बघौना निवासी शारदा राय का ऑक्सीजन स्तर 78 था। उन्हें डॉ. जेपी शुक्ला ने इंजेक्शन और दवाइयां देकर घर पर ही रहने की सलाह दी। अब वे पूरी तरह ठीक हैं। बताती हैं कि डॉक्टर ने यह कह कर भेजा था कि कोरोना तुमसे जरूर हारेगा। शहर के पूर्व सभासद विकास पाण्डेय ने धन्यवाद देते हुए कहा कि डॉक्टर जेपी शुक्ला इस महामारी में जनपद के लिए एक उम्मीद के साथ बिना भेदभाव के लोगों का इलाज कर रहे हैं। मरीजों को सही उपचार बता कर उनका इलाज कर उन्हें स्वस्थ कर रहे हैं। यह महामारी एक मानसिक महामारी भी है। जिसका अनुभव मैंने स्वयं भी किया है। घर में मरीज को नहीं रहता भय डॉक्टर जेपी शुक्ला ने कहा कि कोरोना का अभी कोई इलाज नहीं है। लक्षणों का ही इलाज किया जा रहा है। शरीर के अंदर कौन से लक्षणों के कारण मरीज परेशान है। उसका ही उपचार किया जा रहा है। मैं अपने मरीजों से अधिक उनके परिजनों को समझाता हूं कि मरीज के साथ किस तरह का व्यवहार करना है। किसी भी सूरत में मरीज का आत्मबल नहीं टूटने देना है। उन्होंने बताया कि आज की परिस्थिति में अस्पतालों में मरीज डर रहे हैं। अस्पताल के उपकरण, पीपीई किट में नजर आने वाले डॉक्टर और अन्य पैरा मेडिकल स्टाफ देख मरीज के मन में भय का वातावरण बनाता है। इस दौर में मरीज के अंदर साहस का होना अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि डरने से शरीर की इम्युनिटी घटती है। हिन्दुस्थान समाचार/पंकज/विद्या कान्त




