नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क । भारत बनाम पाकिस्तान के हाई-वोल्टेज T20 वर्ल्ड कप मुकाबले के लिए बनाए गए हालिया प्रोमो ने उत्साह से ज्यादा उलझन पैदा कर दी है। स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टर ने इस बड़े मैच के प्रचार के लिए सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर फुकरा इंसान को चेहरा बनाया, लेकिन नतीजा उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया।
जब मुकाबला क्रिकेट की सबसे चर्चित प्रतिद्वंद्विता का हो, तो प्रस्तुति भी उसी स्तर की होनी चाहिए। मगर प्रोमो में दिखी सतही हास्य-शैली और बनावटी संवादों ने इसकी गंभीरता को हल्का कर दिया। ऐसा लगा मानो रचनात्मक टीम ने गहराई से सोचने के बजाय आसान और जल्दबाजी वाला रास्ता चुन लिया हो। इससे स्पष्ट है कि जब आप ‘फुकरे’ को हायर करते हैं, तो विज्ञापन भी ‘फुकरा’ ही बनता है, जो भद्दा, बेस्वाद और बेमानी लगता है।
दरअसल, फुकरा इंसान, जो यूट्यूब पर रिएक्शन वीडियो के लिए लोकप्रिय हैं, अक्सर दूसरों के कंटेंट पर अपनी प्रतिक्रियाओं से पहचान बनाते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की सबसे बड़ी भिड़ंत को सिर्फ हल्के-फुल्के तंज और कृत्रिम मुस्कानों तक सीमित कर देना दर्शकों की भावनाओं के साथ न्याय नहीं करता। इतने बड़े मंच पर रचनात्मकता, जोश और गरिमा की उम्मीद की जाती है, सिर्फ ट्रेंडिंग चेहरे से काम नहीं चलता।
भारत-पाक भिड़ंत को सिर्फ आंकड़ों में क्यों समेट दिया गया?
भारत-पाकिस्तान मुकाबले के ताजा प्रोमो में आईसीसी नॉकआउट चरण में भारत के 8-1 रिकॉर्ड को इस तरह पेश किया गया मानो यही पूरी दास्तान हो। तथ्य सही है, लेकिन सिर्फ सही होना काफी नहीं, रचनात्मक होना भी उतना ही जरूरी है। जब आपके पास क्रिकेट की सबसे बहुचर्चित प्रतिद्वंद्विता का विशाल कैनवास हो और आप उसी पुराने आंकड़े पर टिक जाएं, तो सवाल उठना लाजिमी है कि कल्पना आखिर गई कहां?
फैंस को ‘वाह’ वाला पल चाहिए, ‘ये तो पहले से पता है’ वाली ऊब नहीं। दर्शक नई दृष्टि चाहते हैं, न कि वही पुरानी सांख्यिकी का दोहराव। क्रिकेट भावनाओं का खेल है, सिर्फ स्कोरलाइन का नहीं।
याद कीजिए 2007 का टी20 विश्व कप फाइनल। कमेंट्री गूंजी थी “इन द एयर… और श्रीसंत ने कैच पकड़ लिया!” उस एक पल ने मैच की दिशा ही नहीं, एक खिलाड़ी की छवि भी बदल दी। मिस्बाह-उल-हक का वह स्कूप शॉट और फिर सालों तक गूंजती एक चुभती पंक्ति “मिस्बाह, पांच रन।” यही तो ट्रोलिंग की असली बारीकी है: एक लम्हा, एक जुमला, जो इतिहास बन जाए।
भारत-पाक मुकाबले ने हमेशा असली नाटक रचा है। वसीम अकरम और वकार यूनिस की स्विंग, जावेद मियांदाद का शारजाह में आखिरी गेंद पर छक्का, शोएब अख्तर बनाम सचिन तेंदुलकर का 2003 विश्व कप टकराव, इन पलों को किसी कृत्रिम मसाले की जरूरत नहीं थी। ये अपने आप में दंतकथाएं हैं। यह प्रतिद्वंद्विता बनावटी गर्मजोशी से नहीं चलती। इसके पीछे इतिहास की परतें हैं, जज्बातों की तीव्रता है और दो देशों की वह क्रिकेटीय जिद है जो मैदान पर खुलकर सामने आती है। ऐसे में इसे महज एक चेहरे या सतही तंज तक सीमित कर देना, विरोधी टीम पर कटाक्ष नहीं, बल्कि इस ऐतिहासिक टकराव की गरिमा को कम करना है।
व्यंग्य की आड़ में विज्ञापन का स्तर गिरा
दक्षिण अफ्रीका पर केंद्रित हालिया विज्ञापन ने व्यंग्य की आड़ में स्तर गिरा दिया। ‘चोकर्स’ का तंज कसते हुए एक साउथ अफ्रीकी फैन के हाथ में कपकेक थमाना और सामने खड़े भारतीय फैन की तिरछी मुस्कान दिखाना, यह सूक्ष्म हास्य नहीं, सतही चुभन थी। रचनात्मकता के नाम पर यह दृश्य ज्यादा शोर करता है, असर कम छोड़ता है। दक्षिण अफ्रीका कोई मामूली टीम नहीं है। वे मौजूदा वर्ल्ड टेस्ट चैंपियन हैं और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उनका कद बेहद ऊंचा है। ‘चोकर्स’ टैग के पीछे सिर्फ असफलता नहीं, कई दिल तोड़ देने वाली कहानियां दबी हैं, जो खेल की त्रासदी और रोमांच दोनों को समेटे हुए हैं।
1992 विश्व कप सेमीफाइनल को याद कीजिए, बारिश और अचानक बदले लक्ष्य ने मुकाबले की दिशा ही बदल दी। वह साधारण हार नहीं, परिस्थितियों की मार थी। फिर 1999 का सेमीफाइनल, लांस क्लूजनर की अविश्वसनीय पारी टीम को जीत की दहलीज तक ले आई, लेकिन आखिरी क्षण का रन-आउट इतिहास बन गया। यह कमजोरी नहीं, खेल का निर्मम मोड़ था। और हाल का फाइनल, जहां आखिरी ओवर तक लड़ाई खिंची, वह भी साबित करता है कि यह टीम आखिरी सांस तक मुकाबला करती है।
हर बार वे गिरे जरूर, मगर हर बार एक नई कहानी भी छोड़ गए। ऐसे संघर्षों का मजाक उड़ाना, वह भी भोजन गले में अटकने जैसे दृश्य से, हास्य नहीं, संवेदनहीनता है। व्यंग्य तब प्रभावी होता है जब उसमें बुद्धिमत्ता हो; यहां सिर्फ ऊपरी तंज है, गहराई नहीं। क्रिकेट की प्रतिद्वंद्विता को धार देने के लिए इतिहास और भावनाएं काफी हैं। उन्हें सस्ते प्रतीकों में समेट देना खेल और उसके किरदारों दोनों के साथ अन्याय है।
ये भी है बड़ा सवाल
सबसे हैरानी की बात यह है कि Star Sports आधिकारिक प्रसारक है। उसकी भूमिका कहानी गढ़ने वाले सूत्रधार की होनी चाहिए, न कि किसी एक पक्ष के ट्रोल की। जब मंच इतना बड़ा हो, तो भाषा और दृष्टि भी उतनी ही परिपक्व होनी चाहिए। एक दौर था जब ‘मौका-मौका’ जैसा अभियान हल्की चुटकी लेते हुए भी प्रतिद्वंद्वी की गरिमा बनाए रखता था। व्यंग्य था, मगर मर्यादा भी थी। उसमें धार थी, लेकिन फूहड़ता नहीं। अब जो दिख रहा है, वह जल्दबाजी में गढ़ी गई सनसनी जैसा लगता है।
विडंबना यह है कि विरोधियों को छोटा दिखाकर भारत को बड़ा साबित करने की कोशिश में कहीं न कहीं भारतीय दर्शकों को ही कमतर आंक लिया गया। मानो दर्शक सिर्फ बनावटी मुस्कानों और उथले तंज पर हंस पड़ेंगे। मानो उन्हें समझ नहीं कि तीखे व्यंग्य और भोंडे कटाक्ष में फर्क क्या होता है। जब टीआरपी की होड़ में आसान और सस्ती तरकीबें अपनाई जाती हैं, तो अंततः हंसी प्रसारक पर ही लौटती है।
याद है वह सबक?
1987 विश्व कप के दौरान पाकिस्तान के प्रशंसक अक्सर गुनगुनाते थे “आ देखें जरा, किसमें कितना है दम।” मगर सेमीफाइनल में उनकी टीम बाहर हो गई। खेल का यही स्वभाव है, अंतिम नतीजा मैदान पर तय होता है, प्रचार के मंच पर नहीं। इतिहास का यही सबक आज भी प्रासंगिक है। जब आप प्रतिद्वंद्वी का मजाक उड़ाने में ऊर्जा खर्च करते हैं, तो कहानी की असली बुनावट हाथ से निकल जाती है। क्रिकेट की खूबसूरती सम्मान में है, क्योंकि बिना सम्मान के जीत भी फीकी लगती है। सच्चा प्रशंसक जानता है कि हिसाब बराबर करने की जगह मैदान है। और इस खेल में कोई भी दिन ऐसा आ सकता है, जब पलटकर वही क्षण आपका ‘फुकरा’ पल बन जाए।





