नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। पेरिस ओलंपिक में कांस्य पदक विजेता मनु भाकर और सरबजोत सिंह के कोच को घर लौटते ही एक बहुत ही बुरी खबर सुनने को मिली। दरअसल राष्ट्रीय पिस्टल शूटिंग कोच समरेश जंग जब घर लौटे तो उन्हें खबर मिली की उनके घर और पूरे इलाके को दो दिनों में ध्वस्त कर दिया जाएगा।
खैबर दर्रे इलाके में रहते हैं समरेश जंग
जंग एक ओलंपियन हैं। वो दिल्ली के सिविल लाइंस में स्थित खैबर दर्रे इलाके में रहते हैं। जंग और इलाके के अन्य निवासियों को आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के भूमि और विकास कार्यालय के द्वारा नोटिस दिया गया है। जिसमें दावा किया गया है कि जिस भूमि पर खैबर दर्रे कॉलोनी स्थित है। वह रक्षा मंत्रालय की है और इसलिए ये कॉलोनी अवैध है।
अर्जुन पुरस्कार विजेता हैं समरेश जंग
इस संबंध में अर्जुन पुरस्कार विजेता जंग ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि ये तोड़फोड़ अभियान क्यों चलाया जा रहा है। कल शाम को घोषणा की गई कि उन्हें दो दिनों के भीतर यह इलाका खाली करना होगा। मेरा परिवार पिछले 75 सालों से यहां रह रहा है। इस संबंध में हम अदालत भी गए, लेकिन हमारी याचिका खारिज कर दी गई।
दो दिनों में घर खाली करना मुश्किल
समरेश जंग ने आगे कहा कि दो दिनों में सामान समेटना और घर खाली करना वाकई मुश्किल है। जंग ने कहा कि हमें बस थोड़ा समय चाहिये घर खाली करने के लिए। यह संभव नहीं है कि आज आप घोषणा कर दें और कल हम घर खाली करके चले जाएं।
सोशल मीडिया पर जंग ने दी जानकारी
2006 के मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों में 5 स्वर्ण, एक रजत और एक कांस्य पदक जीतने वाले समरेश जंग ने सोशल मीडिया पर अपनी व्यथा सुनाई। उन्होंने कहा कि यह चौंकाने वाला है कि भूमि एवं विकास कार्यालय ने सिर्फ दो दिन के नोटिस पर ध्वस्तीकरण की बेतरतीब घोषणा कर दी।
एक ओलंपियन हमेशा सम्मानजनक विदाई की करते हैं उम्मीद
समरेश ने एक्स पर लिखा कि भारतीय निशानेबाजों के द्वारा दो ओलंपिक पदक जीतने की खुशी के बाद मैं, टीम का कोच ओलंपिक से घर लौटा तो ये निराश करने वाली खबर मेरे को मिली। मेरा घर और पूरा इलाका दो दिनों में ध्वस्त कर दिया जाएगा। एशियाई खेलों के पूर्व कांस्य पदक विजेता और बीजिंग ओलंपिक 2008 में भाग लेने वाले जंग ने कहा कि एक ओलंपियन के रूप में हमेशा सम्मानजनक विदाई की उम्मीद करते हैं।
9 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया था फैसला
दिल्ली के सिविल लाइन्स क्षेत्र में खैबर दर्रे पर बड़े पैमाने पर ध्वस्तीकरण अभियान एक महीने पहले शुरू हुआ था। 1 जुलाई को यहां के निवासियों को एक नोटिस जारी किया गया। जिसमें बताया गया कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने 9 जुलाई को अपने फैसले में कहा था कि यह भूमि शुरू में रक्षा मंत्रालय की थी।
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