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Thursday, March 12, 2026
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India Bangladesh relations: भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में खटास, नई सरकार ने दो डिप्लोमैट्स को वापस बुलाया

बांग्लादेश की नई सरकार के आदेश के बाद भारत में नियुक्त दो बांग्लादेशी डिप्लोमैट्स को वापस बुलाया गया। हालांकि उनका अनुबंध अभी समाप्त नहीं हुआ था।

नई दिल्ली, रफ्तार न्यूज। बांग्लादेश में तख्तापलत के बाद अंतरिम सरकार बनी मगर अब भारत और बांग्लादेश के रिश्ते में खटास नजर आ रही है। नई सरकार के आदेश के बाद भारत में तैनात दो बांग्लादेशी डिप्लोमैट्स को बांग्लादेश वापस बुलाया गया। यह आदेश 17 अगस्त को जारी किया गया था। शाबान मबमूद और रंजना सेन प्रेस सचिव के रुप में थे। इन दोनों डिप्लोमैट्स की नियुक्ति शेख हसीना के कार्यकाल में हुई थी। दोनों सचिवों में से शाबान को दिल्ली स्थित उच्चायोग में नियुक्ती मिली थी और रंजना को कोलकाता के कॉन्सुलेट में नियुक्त किया गया था। दोनों का कार्यकाल अभी समाप्त नहीं हुआ था। उनका कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने से पहले ही उनको वापस बुला लिया गया।  

भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में खटास की वजह 

बता दें कि भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में खटास की वजह यह भी है कि शेख हसीना तख्तापलट के बाद भारत आ गई थी और भारत में ही रह रही हैं। उनका डिप्लोमैटिक पासपोर्ट भी बांग्लादेश की नई सरकार ने स्थगित कर दिया था। खबर ये है कि अब नई सरकार से शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की जा सकती है। वर्तमान बांग्लादेशी सरकार ने शेख हसीना कार्यकाल के कई नेताओं को देश छोड़ने से रोका है और उनके खिलाफ केस भी चलाए जा रहे हैं। 

हिंसा में मारे गए लोगो की संख्या 

शेख हसीना 5 अगस्त को हेलीकॉप्टर के जरिए बांग्लादेश से भारत आई थीं। वहां के प्रर्दशनकारियों ने ढाका की सड़कों पर जमकर उत्पात मचाया था। हसीना के राष्टपति पद से हटने की वजह से पूरे देश में भयंकर हिंसा हो रही थी और उस हिंसा में करीबन 450 से अधिक लोग मारे गए थे।   

बांग्लादेश में हिंसा का कारण  

दरअसल बांग्लादेश में जुलाई में हाईकोर्ट के द्वारा सरकारी नौकरियों के लिए कोटा प्रणाली को बहाल करने के बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। इस कानून के जरिए 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में लड़ने वाले के परिवारों के लिए 30% सरकारी नौकरियां आरक्षित होंगी। जब छात्रों ने इस कानून को खत्म करने के लिए विरोध किया था तो शेख हसीना ने नौकरी कोटा का विरोध करने वालों को रजाकार (जिन्होंने 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना के साथ सहयोग किया था) करार कर दिया था। इसके कारण वहां के छात्र विरोध करने के लिए ढाका विश्वविधालय में अपने छात्रावासों से निकल आए। 

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