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Thursday, March 19, 2026
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बांग्लादेश में हिन्‍दुओं पर नहीं थम रहा अत्याचार, अमेरिकी संगठनों ने ट्रंप-बाइडेन के सामने रखी मांग

अमेरिका स्‍वयं को ताकतवर देश मानता है और विश्‍व में मानवाधिकार के विषयों में हर जगह उसका हस्‍तक्षेप देखने को मिलता है।

नई दिल्ली, रफ्तार डेस्‍क। भारतीय-अमेरिकी सदस्यों के एक सामाजिक और आर्थ‍िक संगठन ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों खासकर हिन्‍दुओं को निशाना बनाए जाने पर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से हस्तक्षेप की मांग की गई है। इन दोनों से कहा गया है कि आप इस मामले को गंभीरता से लें। अमेरिका स्‍वयं को ताकतवर देश मानता है और विश्‍व में मानवाधिकार के विषयों में हर जगह उसका हस्‍तक्षेप देखने को मिलता है, लेकिन पिछले तीन महीनों से भी अधि‍क समय से जो कुछ भी बांग्‍लादेश में अल्‍पसंख्‍य हिन्‍दू, ईसाई, एवं अन्‍य के साथ जो घट रहा है, उसे होने से रोकने के लिए वहां की यूनुस सरकार पर कोई दवाब डालता नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में वह अपना हस्‍तक्षेप करे और हिन्‍दुओं एवं अन्‍य अल्‍पसंख्‍यकों पर हो रहे हमलों की स्वतंत्र जांच करें। संगठन का कहना यह भी है कि वर्तमान बांग्‍लादेश के हालातों को देखकर स्‍पष्‍ट नजर आता है कि भारत का पड़ोसी देश अब कट्टरपंथी देश बनता जा रहा है । 

दरअसल, इस्‍कॉन के संत चिन्मय कृष्णदास की गिरफ्तारी और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के मद्देनजर FIIDS (फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज) के अध्यक्ष खंडेराव कांड ने एक पत्र लिखकर ये मांग की है कि बाइडेन और ट्रम्प नोटिस लें और हस्तक्षेप करें। एफआईआईडीएस के अध्‍यक्ष खंडेराव का कहना है कि इस जुल्म और इससे होने वाले विस्थापन को तत्‍काल रोका जाना जरूरी है । 

साल 1971 के युद्ध में लाखों हिंदुओं का हुआ नरसंहार 

FIIDS ने बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की अनिश्चित स्थिति पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से हिंदू के खिलाफ की जानेवाली हिंसा का एक लंबा और दुखद इतिहास देखने को मिलता है। हम बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ते मानवाधिकारों के उल्लंघन पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त करने के लिए लिख रहे हैं , जो कि हाल ही में हिंदू आध्यात्मिक नेता चिन्मय कृष्ण दास ब्रह्मचारी की गिरफ्तारी के रूप में तथा इससे पहले और बाद में भी कई अन्‍य अत्‍याचारों के रूप में देखने को मिल रहा है। इस पत्र में कहा गया है कि बांग्‍लादेश में 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान, लाखों हिंदुओं को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाया गया था, जिसे 20वीं सदी के सबसे बुरे नरसंहारों में से एक के रूप में अब भी दर्दनाक रूप से याद किया जाता है।

हिन्‍दुओं की 1947 से 2024 के बीच खत्म हो गई 12 प्रतिशत जनसंख्‍या

इस रिपोर्टों में कहा गया है कि अब तक 30 लाख से अधिक लोग मारे गए हैं और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं। सामूहिक हत्याओं, जबरन धर्म परिवर्तन और निष्कासन के कारण हिंदू आबादी में काफी गिरावट आई है। एफआईआईडी के बयान में कहा गया है कि अल्पसंख्यक आबादी, मुख्य रूप से हिंदू , जो 1947 में पूर्वी पाकिस्तान की आबादी का लगभग 20 प्रतिशत थी। यह संख्या अब बांग्लादेश में 8 प्रतिशत से भी कम रह गई है, जो चल रहे उत्पीड़न की एक कठोर याद दिलाती है। यहां पर आज के वक्‍त में अल्पसंख्यकों को हिंसा और भेदभाव का भारी सामना करना पड़ रहा है। 

इस साल की शुरुआत में शासन परिवर्तन में योगदान देने वाले छात्र-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों के दौरान अशांति की नवीनतम लहर के परिणामस्वरूप हिंदू मंदिरों और अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक संस्थानों पर व्यापक हमले हुए हैं। अगस्त 2023 में शेख हसीना के नेतृत्व वाली सरकार के पतन के बाद से हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की 200 से अधिक प्रलेखित घटनाएं हुई हैं, जिनमें आगजनी, भीड़ के हमले और पूजा स्थलों को अपवित्र करना शामिल है। 

मानवाधिकारों के वैश्विक चैंपियन के रूप में है अमेरिका

फाउंडेशन फॉर इंडिया एंड इंडियन डायस्पोरा स्टडीज का कहना है कि इस्कॉन ‘शांति और धार्मिक सद्भाव का प्रतीक’ है, जो दुनिया भर में अपने मानवीय प्रयासों के लिए प्रसिद्ध है। आप देख सकते हैं कि कैसे इस्कॉन ने अपने प्रति शत्रुता रखनेवालों को भी लगातार आपदा राहत और खाद्य सुरक्षा प्रदान की है। इसलिए अब इन हालातों को देखते हुए यह जरूरी हो जाता है कि बांग्लादेश के करीबी सहयोगी और मानवाधिकारों के वैश्विक चैंपियन के रूप में, संयुक्त राज्य अमेरिका को इस तत्काल स्थिति से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। समूह ने बिडेन प्रशासन से बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के साथ जुड़ने और जवाबदेही की वकालत करने का अनुरोध किया है ।

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