World Suicide Prevention Day: हर 40 सेकेंड में एक आत्महत्या, जानिए सुसाइड का ख्याल आने पर क्या करें ?

World Suicide Prevention Day: विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस हर साल 10 सितंबर को मनाया जाता है। इसे मनाने का उद्देश्य आत्महत्या के बारे में बातचीत शुरू करना और यह दिखाना है कि इसकी रोकथाम संभव है।
World Suicide Prevention Day
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नई दिल्ली, (योगेश कुमार गोयल)। दुनियाभर में तेजी से बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 10 सितम्बर को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सहयोग से ‘विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस’ मनाया जाता है। इस दिवस की शुरुआत ‘इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर सुसाइड प्रिवेंशन’ (आईएएसपी) द्वारा 2003 में की गई थी। इन दिन एक पीले रंग के रिबन को प्रतीक के रूप में पहना जाता है, जो इस बात को फैलाने में मदद करने के लिए पहना जाता है कि आत्महत्या की रोकथाम के बारे में बोलने से लोगों की जान बचाई जा सकती है। इस दिवस को मनाने का प्रमुख उद्देश्य आत्महत्या करने वाले व्यक्ति के व्यवहार पर शोध करना, जागरुकता फैलाना और डेटा एकत्र करना है। दरअसल डब्ल्यूएचओ के मुताबिक दुनिया में हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है यानी प्रतिवर्ष दुनियाभर में करीब आठ लाख लोग आत्महत्या करते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में 15 से 29 वर्ष के लोगों में होते हैं जबकि आत्महत्या का प्रयास करने वालों का आंकड़ा इससे बहुत ज्यादा है।

थीम का उद्देश्य अपने काम के जरिये लोगों के बीच उम्मीद पैदा करना

प्रतिवर्ष विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस की एक थीम निर्धारित की जाती है। आत्महत्या रोकथाम दिवस की 2023 की थीम है ‘क्रिएटिंग होप थ्रू एक्शन’। इस थीम का उद्देश्य अपने काम के जरिये लोगों के बीच उम्मीद पैदा करना है। लोगों में अवसाद निरन्तर बढ़ रहा है, जिसके चलते ऐसे कुछ व्यक्ति आत्महत्या जैसा हृदयविदारक कदम उठा बैठते हैं। लोगों में जीवन से निराश होकर आत्महत्या की बढ़ती दुष्प्रवृत्ति गंभीर चिंता का सबब बन रही है। कोरोना काल में लोगों में हताशा और निराशा ज्यादा बढ़ी, जिससे आत्महत्या का प्रतिशत भी लगातार बढ़ा। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के अनुसार दुनियाभर में 79 फीसदी आत्महत्या निम्न और मध्यवर्ग वाले देशों के लोग करते हैं और इसमें बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की होती है, जिनके कंधों पर किसी भी देश का भविष्य टिका होता है।

2021 में देश में 164033 लोगों ने आत्महत्या की

बीते वर्षों में दुनियाभर में खुदकुशी की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं लेकिन भारत में आत्महत्याओं का आंकड़ा काफी चिंताजनक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने वर्ष 2021 में भारत में आत्महत्या के मामलों को लेकर ‘भारत में आकस्मिक मौतें एवं आत्महत्याएं-2021’ रिपोर्ट जारी की थी, जिसके मुताबिक 2021 में देश में 164033 लोगों ने आत्महत्या की। एनसीआरबी के मुताबिक आत्महत्या की घटनाओं के पीछे पेशेवर या करियर संबंधी समस्याएं, अलगाव की भावना, दुर्व्यवहार, हिंसा, पारिवारिक समस्याएं, मानसिक विकार, शराब की लत, वित्तीय नुकसान, पुराने दर्द इत्यादि मुख्य कारण हैं। इस रिपोर्ट से साफ है कि कोरोना के कारण आर्थिक स्थिति में उतार-चढ़ाव, पारिवारिक कलह, रिश्तों में टूटन तथा बीमारी से परेशानी सहित कई अन्य कारणों के चलते देश में 2021 में आत्महत्या का आंकड़ा 2020 के मुकाबले करीब 7.2 फीसदी बढ़ा। 2020 में 153052 लोगों ने आत्महत्या की थी। मनोचिकित्सकों के मुताबिक इंसान को कोरोना ने शारीरिक रूप से जितना बीमार किया, उससे कहीं ज्यादा मानसिक तनाव दिया है। छात्र अपनी शिक्षा एवं भविष्य को लेकर गहरे असमंजस में हैं। किसी को करियर या नौकरी की चिंता सता रही है तो कोई वित्तीय संकट से जूझ रहा है। तनाव के दौर में निजी रिश्तों में भी खटास बढ़ी है और आमजन में नकारात्मक विचारों का बढ़ता प्रवाह तथा उपरोक्त चिंताएं कई बार अवसाद का रूप ले लेती हैं, जिसके चलते कुछ लोग परेशानियों से निजात पाने के लिए आत्महत्या का खतरनाक रास्ता चुन लेते हैं।

अवसाद के कारण ऐसे कुछ लोग आत्महत्या कर लेते हैं

जब कोई व्यक्ति ज्यादा बुरी मानसिक स्थिति से गुजरता है तो एकाएक अवसाद में चला जाता है और इसी अवसाद के कारण ऐसे कुछ लोग आत्महत्या कर लेते हैं, जिसका उनके परिवार के साथ-साथ समाज पर भी बहुत नकारात्मक असर पड़ता है। विशेषज्ञों के मुताबिक अवसाद और तनाव के कारण ही लोगों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है और जब व्यक्ति को परेशानियों से बाहर निकलने का कोई मार्ग नजर आता, ऐसे में वह आत्महत्या जैसा हृदयविदारक कदम उठा बैठता है। हालांकि जिन लोगों का मनोबल मजबूत होता है, वे प्रायः विकट परिस्थितियों से उबर भी जाते हैं लेकिन अवसाद के शिकार कुछ लोग विषम परिस्थितियों से लड़ने के बजाय हालात के समक्ष घुटने टेक स्वयं को मौत के हवाले कर देते हैं। मनोचिकित्सकों के अनुसार आत्महत्या की प्रवृत्ति काफी गंभीर समस्या है और आत्महत्या करने के पीछे अधिकांशतः अवसाद को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है, जो ऐसे करीब 90 फीसदी मामलों का प्रमुख कारण भी है लेकिन सभी आत्महत्याओं के लिए अवसाद को ही पूरी तरह जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उनके मुताबिक आत्महत्या करने का विचार किसी इंसान के अंदर तब पनपता है, जब वह किसी मुश्किल से बाहर नहीं निकल पाता।

परेशानियों के बारे में खुलकर बात करें

मनुष्य जीवन को संसार में सबसे अनमोल माना गया है क्योंकि हमारा यह जीवन एकमात्र ऐसी चीज है, जिसे हम दोबारा नहीं पा सकते। बहरहाल, यदि कभी जरूरत से ज्यादा तनाव अथवा किसी मानसिक बीमारी का अहसास हो तो तुरंत किसी मनोचिकित्सक से मिलकर अपनी परेशानियों के बारे में खुलकर बात करें। केन्द्र सरकार द्वारा अगस्त 2020 में एक मेंटल हेल्थ रिहैबिलिटेशन हेल्पलाइन (किरण हेल्पलाइन) नंबर भी जारी किया गया था, जिस पर कॉल करके ऐसी स्थिति में मदद या काउंसिलिंग की मांग की जा सकती है। इसके अलावा भी कई सुसाइड हेल्पलाइन नंबर उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग आत्महत्या की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए किया जा सकता है। लोगों में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता फैलाकर भी आत्महत्या जैसे मामलों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। किसी भी व्यक्ति के मन में आत्महत्या का विचार आए ही नहीं, ऐसा वातावरण तैयार करना परिवार के साथ-साथ समाज की भी बड़ी जिम्मेदारी है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं, एवं यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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