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Wednesday, March 4, 2026
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जब 37 साल तक बिना CM के रही थी दिल्ली, साल 1991 में साफ हुआ था विधानसभा मिलने का रास्ता

दिल्ली में एक दौर ऐसा भी था जब, न कोई मुख्यमंत्री था, न ही विधानसभा। ऐसे में इस दौरान प्रशासन कैसे चलता था आइए जानते हैं।

नई दिल्‍ली/रफ्तार डेस्क। दिल्ली में आज 5 फरवरी को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान शुरु हो चुका है। इस चुनावी गहमागहमी में ये बात तो साफ है कि दिल्ली की राजनीति हमेशा से ही दिलचस्प रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक ऐसा भी दौर था जब दिल्ली में न कोई मुख्यमंत्री था, न ही विधानसभा थी। ऐसे में इस दौरान प्रशासन कैसे चलता था, आइए जानते हैं- दिल्ली की पहली विधानसभा का चुनाव 27 मार्च 1952 को हुआ था, तब टोटल 48 सीटों पर चुनाव हुए थे। कांग्रेस ने इसमें 39 सीटों पर जीत हासिल कर बहुमत हासिल किया था। चौधरी ब्रह्मप्रकाश दिल्‍ली के पहले मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन उनका कार्यकाल विवादों में घिरने के बाद सरदार गुरमुख निहाल सिंह को दूसरा मुख्यमंत्री बनाया गया था। 

दिल्ली में 37 सालों तक कोई सीएम नहीं रहा था

राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश के बाद दिल्ली की सियासत में बड़ा बदलाव 1956 में आया। जब केंद्र सरकार ने दिल्ली विधानसभा को भंग करके केंद्र शासित प्रदेश बना दिया। इसके लागू होने के बाद प्रदेश में उपराज्यपाल का शासन आ गया। असल में साल 1955 में केंद्र सरकार ने राज्य पुर्नगठन आयोग बनाया। इस आयोग की कमान फजल अली को दी गई। इन्हीं की सिफारिश के बाद दिल्ली से पूर्ण राज्य का दर्ज छिन लिया गया। इसी कारणवश दिल्ली में 37 सालों तक कोई सीएम नहीं रहा था। 

महानगर परिषद का गठन

दिल्ली में लोकतांत्रिक और प्रशासनिक व्यवस्था को चलाने के लिए 1966 में दिल्ली प्रशासन अधिनियम लागू किया गया। इसके तहत महानगर परिषद बनाई गई थी। इसमें 56 सदस्य चुने जाते थे और 5 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते थे। यह काउंसिल दिल्ली का प्रशासन संभालती थी। 1966 से 1990 तक मेट्रोपॉलिटन काउंसिल दिल्ली का प्रशासन संभालता रहा। 

ऐसे मिली दिल्ली को अपनी विधानसभा

दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग साल 1980 के बाद से तेज हुई, तब साल 1987 में सरकारिया कमेटी का गठन हुआ। साल 1989 में इस कमेटी की रिपोर्ट में साफ लिखा गया कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना चाहिए, भले ही कुछ क्षेत्रों पर केंद्र का क्यों न प्रभाव रहे। 1991 में नरसिम्हा राव की सरकार ने नेशनल कैपिटल टेरिटरी एक्ट पास किया। इसके बाद दिल्ली में पहली बार 1993 में चुनाव हुआ और बीजेपी की सरकार बनी।

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