नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में 144 वर्षों बाद आए इस महाकुंभ में देश दुनिया से साधु संत, तपस्वी, श्रद्धालु ले रहे इस महान तपोभूमि का लाभ। जहां एक ओर त्रिवेणी का संगम स्नान हैं तो वहीं दूर-दूर से आए अघोरी, साधु संत के तपस्या का केंन्द्र जिसे आमजन इनके कृतार्थ का लाभ ले अपने जीवन का कर रहें उद्धार। महाकुंभ में हमेशा से आकर्षण का केंन्द्र रहे नागा साधु जिनकी रहस्यमयी दुनिया और तपोवन जीवनशैली हमेशा से लोगों को आकर्षित करती रही है। सभी के मन में एक जिज्ञासा हमेशा से जानने को रही हैं कि आखिर कहा से आते हैं ये नागा साधु और कुंभ, व महाकुंभ के उपरांत गायब भी हो जाते हैं तो कहा चले जाते हैं ये दुर्लभ नागा साधु। जो आमजन के लिए सदैव रहस्य ही रहें है। इनकी कठोर तपस्या व कठिन जीवनशैली हमेशा से अन्य साधुओं से इन्हें अलग रखती रही है।
कुंभ के समय इनकी अलौकिक तपस्या
ये नागा साधु अपने निर्वस्त्र अवतार, व शरीर पर भस्म लंबी जटाओं के कारण भीड़ से भिन्न नजर आते है। ये अपने दिगम्बर रूप के कारण प्रसिद्ध होते हैं। क्योंकि इनकी जीवनशैली धरती से ही शुरु धरती ही अंन्त होती है। जमीन बिछौना और अम्बर ओढ़ना होता है। कुंभ के समय इनकी अलौकिक तपस्या प्रार्थना अद्वितीय प्रभाव देती है। मालूम हो कि जगद्गुरु शंकराचार्य ने सनातन संस्कृति के सुरक्षा हेतु ईसवी सदी से करीब सात सौ साल पहले ही युवा संन्यासियों की सेना बनाई जिसे कभी ना खत्म होनेवाला नाम दिया ‘अखंड’ बस फिर क्या था। कहा जाता है कि उन्होंने सनातन की रक्षा के लिए शस्त्र विद्या में निपुण साधुओं के संगठन बनाए थे। जिसमें अभी कुल 13 अखाड़े हैं, जिन्हें तीन श्रेणियों- शैव, वैष्णव और उदासीन में बांटा गया है. शैव संप्रदाय के कुल 7 अखाड़े हैं, इनके अनुयायी भगवान शिव की पूजा करते हैं. वैष्णव संप्रदाय के 3 अखाड़े हैं, इनके अनुयायी भगवान विष्णु और उनके अवतारों की पूजा करते हैं. उदासीन संप्रदाय के 3 अखाड़े हैं, इनके अनुयायी ‘ॐ’ की पूजा करते हैं. ॐ अनन्त शक्ति का प्रतीक है।
सात मुख्य अखाड़े बनाए गए
वहीं शैव अखाड़े की बात करे तो यहीं युवा संन्यासियों की पीढ़ी आगे चलकर अखाड़ा बनी, वहीं इनके उत्तम नियोजन हेतु इनके अखंड में भी विभाजन हुआ, वहीं इन संन्यासियों के शैव मत के लिए सात मुख्य अखाड़े बनाए गए जिसमें जूना, आवाहन, अग्नि, महानिर्वाणी, अटल, निरंजनी और आनंद जैसें अखाड़ों का निर्माण किया गया। और इनकी सेना का विस्तार होता गया जिससे इनके धार्मिक यात्राएं भी बढ़ती गई। वहीं इस नागा साधुओं की बात करें तो इनकी तपस्या इनकी साधना अन्य साधुओं से बिल्कुल ही अलग होती है। पहली बात तो किसी भी साधु का जीवन आसान नही होता लेकिन वहीं अगर नागा साधुओं की बात करें तो यहा तक पहुंचना ही किसी तपस्या से कम नही होता। वैसें तो अखाड़ों के मूल देव तो भोलेनाथ ही होते है।
इन अखाड़ों की विशेष प्रथा हैं
सबके आराध्य देवता अलग-अलग बनाए हुए हैं। वे सभी समाज निर्माण में अपना योगदान करते है। इन अखाड़ों की विशेष प्रथा हैं जिसमें महाकुंभ से पहले ही धर्म ध्वजा लगाई जाती है। इसका सामान्य अर्थ ये होता है कि अब महाकुंभ में पूरे महीनें अखाड़े के सभी संन्यासियों और श्रद्धालुओं के रहने और खाने की व्यवस्था के लिए अखाड़ा तैयार हो गया है। वैसें अखाड़ों की धर्म ध्वजा का रंग भगवा ही होता है लेकिन इनके दंड पर फहराने के तरीके अलग अलग होते है। महाकुंभ के दौरान नागा साधु अपने कमांडो के साथ शास्त्रों व शस्त्रों की शिक्षा भी लेते है। वहीं बात करें इनके उद्ददेश्य की तो ये पहले ही लोक और परलोक चिंता त्याग चूके होते है। क्योंकि स्वयं को स्वयं से ही मुक्त कर कर यहां पहुचें हैं। सभी कुंभ में पहले अमृत स्नान के बाद दूसरे से पहले नए नागा संन्यासी दीक्षित किए जाते हैं। वो भी एक पारंपरिक विधि अलग होती है। नागा संन्यासी बनना इतना आसान नही होता। नागा साधु कुंभ के बाद निर्वस्त्र नहीं रहते क्योंकि ये समाज में स्वीकार नहीं होता तो वे गमछा पहनकर आश्रमों में निवास करते हैं। उनका दिगम्बर रूप केवल कुंभ के दौरान ही देखा जाता है।
धार्मिक यात्राएं भी करते हैं
कुंभ महाकुंभ के खत्म होने के बाद, नागा साधु अपने-अपने अखाड़ों में लौटकर प्रयागराज, नासिक, हरिद्वार और उज्जैन जैसे प्रमुख तीर्थ स्थलों पर निवास कर गहन ध्यान और साधना करते हैं. यहां वे धार्मिक शिक्षा भी देते हैं और अपने जीवन को तपस्वी तरीके से बिताते हैं. कई नागा साधु तो हिमालय के जंगलों में तपस्या करने चले जाते हैं। वहां वे कठोर साधना कर, फल-फूल खाकर जीवन निर्वाह करते हैं और आत्मज्ञान की प्राप्ति के प्रयासरत में लगे रहते हैं। और अपने जीवन को तपस्वी तरीके से बिताते हैं. वे वहां कठोर साधना करते हैं, फल-फूल खाकर जीवन निर्वाह करते हैं और आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहते हैं. और समय-समय पर धार्मिक यात्राएं भी करते हैं.





