नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क । गुजरात के अहमदाबाद में एयर इंडिया का यात्री विमान गुरुवार दोपहर को सरदार वल्लभ भाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट के रनवे से टेकऑफ के दौरान हादसे का शिकार हो गया। इस दर्दनाक घटना में 265 लोगों की मौत हुई है। इसमें से 12 क्रू मेंबर्स थे। इस बीच, एक बड़ी जानकारी सामने आई है कि मामले में जांच एजेंसी और NSG को क्रैश हुए विमान का DVR बरामद हुआ है।
ब्लैक बॉक्स दुर्घटना का पता लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, और अब इस बॉक्स से हादसे का कारणों का पता लगाया जा सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ब्लैक बॉक्स होता क्या और किस तरह से इसकी मदद से क्रैश विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के कई पोल खोल सकता है। इसके पीछे की तकनीकी को अच्छे से जानते हैं।
क्या होता है ब्लैक बॉक्स?
ब्लैक बॉक्स एक खास तरह का डिवाइस होता है, जो हर विमान में लगाया जाता है और इसका काम होता है फ्लाइट से जुड़ी जरूरी जानकारी रिकॉर्ड करना। इसका रंग चमकीला नारंगी होता है। ताकि हादसे के बाद इसे आसानी से सर्च किया जा सकें।
दो हिस्सों में बंटा होता है ब्लैक बॉक्स
एक ब्लैक बॉक्स दो भागों में बंटा होता है। इसमें से एक होता है CVR जिसे कि कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (Cockpit Voice Recorder ) कहते हैं। इसमें पायलट और सह-पायलट की बातचीत, अलार्म और कॉकपिट की आवाजें रिकॉर्ड होती हैं।
वहीं, दूसरा भाग होता है FDR यानी कि फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (Flight Data Recorder), इसमें विमान से जुडे डेटा को रिकॉर्ड किया जाता है। इस डेटा में प्लेन की ऊंचाई, गति, दिशा, इंजन की स्थिति आदि टेक्निकल डेटा रिकॉर्ड होता है। जब कोई विमान हादसे का शिकार होता है, तो ब्लैक बॉक्स की मदद से कारण सामने आता है कि हादसे से पहले क्या हुआ था।
विमानों की कमियों को करता है दूर
इसे काफी मजबूत बिल्ड के साथ तैयार किया जाता है ताकि, यह हादसे के बाद भी सुरक्षित बचा रहें। दुनियाभर में अब तक हुए कई विमान हादसों की पीछे की कमियों को ब्लैक बॉक्स की मदद से सुलझाया गया है। इससे मिले डेटा के आधार पर ही एविएशन इंडस्ट्री से जुड़े कड़े नियम-कायदे समय के साथ तैयार हुए।
ऐसे खोलता है दुर्घटना के राज
जब कोई प्लेन हादसे का शिकार होता है, तो जांच एजेंसियां सबसे पहले ब्लैक बॉक्स का ढूंढती है, क्योंकि उसी में विमान से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण जानकारी रिकॉर्ड हुई रहती है। जैसा कि हमने ऊपर के पैरा में बताया कि ब्लैक बॉक्स दो भागों में बना रहता है। एक भाग पायलटों की आवाजें और कॉकपिट की बातचीत रिकॉर्ड करता है जिसे CVR कहते हैं और दूसरा डीवीआर।
वहीं, दूसरा भाग प्लेन की टेक्नोलॉजी से जुड़ी जानकारी जैसे गति, ऊंचाई, दिशा, इंजन की स्थिति आदि को रिकॉर्ड करता है। इसे FDR कहते हैं। जब प्लेन क्रैश होता है, तो ब्लैक बॉक्स में मौजूद यह डेटा सुरक्षित रहता है, क्योंकि इसे बहुत मजबूत और बिल्ट बनाया जाता है।
कैसे होता है खुलासा
इस डिवाइस में एक छोटा सा सिग्नल देने वाला टूल भी होता है, जो पानी में गिरने पर भी 30 दिन तक अपनी लोकेशन की जानकारी देता है, ताकि उसे खोजा जा सकें। जब जांच एजेंसी ब्लैक बॉक्स को बरामद करती हैं तो वे इसमें रिकॉर्ड हुई सभी जानकारियों को खास कंप्यूटर सिस्टम की मदद से पढ़ते हैं। पायलटों की आखिरी बातचीत, अलार्म की आवाजें, और तकनीकी खामी की जानकारी से पता चलता है कि हादसे से पहले क्या-क्या हुआ। इससे ये जानने में मदद मिलती है कि हादसे का कारण तकनीकी खराबी था, मौसम था, या मानवीय गलती। इस तरह ब्लैक बॉक्स दुर्घटना की असली वजह जानने में खास भूमिका निभाता है।





