नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर सोमवार को संसद में ऐतिहासिक चर्चा की शुरुआत हुई। इस बहस की शुरुआत खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में संबोधन के साथ की। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने वंदे मातरम् को केवल आज़ादी का नारा नहीं, बल्कि देश को आत्मनिर्भर और विकसित बनाने की प्रेरणा बताया।
”वंदे मातरम् केवल आज़ादी की लड़ाई का नारा नहीं था”
पीएम मोदी ने कहा कि जिस मंत्र ने आज़ादी के आंदोलन को ऊर्जा दी, त्याग और तपस्या का रास्ता दिखाया, उस वंदे मातरम् को याद करना हम सबके लिए गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि यह हम सभी का सौभाग्य है कि हम वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक पल के साक्षी बन रहे हैं। प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि वंदे मातरम् केवल राजनीतिक आज़ादी की लड़ाई का नारा नहीं था, बल्कि यह मातृभूमि को हर तरह की गुलामी से मुक्त कराने की सोच का प्रतीक था। उन्होंने कहा कि आज जब देश 2047 तक विकसित भारत बनने का लक्ष्य लेकर चल रहा है, तब वंदे मातरम् इस संकल्प को दोहराने का बड़ा माध्यम है।
PM मोदी ने बंकिम चंद्र चटर्जी को किया याद
पीएम मोदी ने ‘वंदे मातरम्’ के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी को भी याद किया। उन्होंने बताया कि इस गीत की शुरुआत वर्ष 1875 में हुई थी, जब 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजी हुकूमत और ज्यादा क्रूर हो गई थी। उस समय अंग्रेज अपना गीत ‘गॉड सेव द क्वीन’ घर-घर पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन वंदे मातरम् भारतीय आत्मा की आवाज बनकर उभरा। प्रधानमंत्री मोदी ने आपातकाल का जिक्र करते हुए कहा कि जब वंदे मातरम् के 100 साल पूरे हुए थे, तब देश आपातकाल की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। उन्होंने कहा कि उस समय संविधान का गला घोंट दिया गया था और देशभक्ति के लिए जीने-मरने वाले लोगों को जेल में डाल दिया गया था। उन्होंने उस दौर को भारत के इतिहास का काला अध्याय बताया।
जीने-मरने वाले लोगों को जेल में डाल दिया- बोले PM मोदी
प्रधानमंत्री मोदी ने आपातकाल का जिक्र करते हुए कहा कि जब वंदे मातरम् के 100 साल पूरे हुए थे, तब देश आपातकाल की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। उन्होंने कहा कि उस समय संविधान का गला घोंट दिया गया था और देशभक्ति के लिए जीने-मरने वाले लोगों को जेल में डाल दिया गया था। उन्होंने उस दौर को भारत के इतिहास का काला अध्याय बताया। पीएम मोदी ने कहा कि वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होना केवल एक तारीख नहीं, बल्कि इतिहास की अनगिनत घटनाओं को याद करने का अवसर है। यह चर्चा न सिर्फ संसद की प्रतिबद्धता को दर्शाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणादायक साबित होगी।





