नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। देश की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की आज जंयती है। 14 फरवरी 1952 को अंबाला कैंट में जन्मी सुषमा स्वराज एक कुशल राजनीतिज्ञ, प्रखर वक्ता और शालीनता की परिचायक रही हैं। दिल्ली मे जब साहिब सिंह वर्मा के नेतृ्त्व में बीजेपी सरकार चल रही थी तो बढ़ती हुई प्याज की कीमतों के चलते उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। उनके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री पद के लिए किसी चेहरे को विश्वसनीय माना गया तो वह सुषमा स्वराज हीं थी। इसके बाद वह देश की संसद में पहुंची और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ उनके किस्से आज भी जीवंत हैं।
जब मनमोहन सिंह पर शायरी के जरिए वार कर रही थीं सुषमा स्वराज
15वीं लोकसभा में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मौजूद थे और नेता प्रतिपक्ष का पद सुषमा स्वराज के पास था। सुषमा स्वराज के पास बोलने की ऐसी शानदार कला थी कि वह बिना किसी अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए ऐसी बाते कह देती थीं जिस न सिर्फ प्रभावी होती थी बल्कि तथ्यात्मक भी होती थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बीजेपी पर हमलावर होते हुए कह रहे थे कि ‘हम को उनसे वफा की है उम्मीद, जो नहीं जानते वफा क्या है।’ सुषमा स्वराज ने बिना लाग लपेट के उन्हें उसी शायराना अंदाज में जवाब देते हुए कहा कि ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही नहीं कोई बेवफा होता।’ इसके बाद उन्होंने कहा कि अगर आपके 1 शेर के जवाब में 2 शायरी न पढ़ी तो कर्ज बाकी रह जाएगा। और फिर उन्होंने दूसरी शायरी पढ़ी- तुम्हें वफा याद नहीं, हमें जफा याद नहीं, जिंदगी और मौत के दो ही तराने है, एक तुम्हें याद नहीं, एक हमें याद नहीं। संसद का वह सत्र आज भी सुषमा स्वराज के शायराना अंदाज के लिए जाना जाता है।
संस्कृत में शपथ लेती थीं सुषमा स्वराज
सुषमा स्वराज जिन भी संवैाधानिक पदों पर रहीं उन्होंने उसकी शपथ संस्कृत भाषा में ली। वह न सिर्फ संस्कृत में शपथ लेती थी बल्कि संस्कृत भाषा में धाराप्रवाह भाषण भी दिया करती थीं। संस्कृत के अलावा अंग्रेजी भाषा पर भी उनकी पकड़ शानदार थी। और जब वह कर्नाटक से चुनाव लड़ रही थीं तो उन्होंने कन्नड़ भाषा में भाषण देकर सबको हैरान कर दिया।





