नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की एक पुस्तक में न्यायपालिका को लेकर प्रकाशित कथित आपत्तिजनक सामग्री पर कड़ा रुख अपनाया है। यह मामला नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) की सोशल साइंस की पुस्तक ‘एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ से जुड़ा है, जिसके फरवरी 2026 संस्करण में न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार से संबंधित टिप्पणियां होने की खबर सामने आई। रिपोर्ट्स के आधार पर अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह एक “सोचा-समझा कदम” और संभवतः “गहरी साजिश” भी हो सकती है। अदालत ने कहा कि यदि छात्रों को यह पढ़ाया जाएगा कि भारतीय न्यायपालिका भ्रष्ट है और शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं होती, तो इसका व्यापक सामाजिक प्रभाव पड़ेगा। सीजेआई ने यह भी कहा कि व्यवस्था के तीनों अंग-विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका-लोकतंत्र के संतुलन के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं और किसी एक के खिलाफ गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी स्वीकार्य नहीं हो सकती।
बिना शर्त माफी, फिर भी जांच जारी
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि संबंधित अध्याय को किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता और NCERT की ओर से बिना शर्त माफी मांगी जाती है। उन्होंने अदालत को बताया कि पुस्तक की 32 प्रतियां बाजार में गई थीं, जिन्हें वापस मंगा लिया गया है और पूरी किताब की समीक्षा की जाएगी।
हालांकि अदालत ने कहा कि केवल माफी पर्याप्त नहीं है। सीजेआई ने रजिस्ट्रार जनरल से मामले की गहन जांच कराने की बात कही और पूछा कि यह सामग्री पुस्तक में कैसे शामिल हुई। जस्टिस बागची ने डिजिटल युग का उल्लेख करते हुए कहा कि पीडीएफ और ऑनलाइन प्रसार की जांच भी जरूरी है, क्योंकि ऑनलाइन सर्कुलेशन हार्ड कॉपी से कहीं अधिक हो सकता है।
सीनियर एडवोकेट विकास सिंह और अभिषेक मनु सिंघवी ने भी इस मुद्दे पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिम्मेदार लोगों की पहचान कर कार्रवाई की जाएगी और मामला यूं ही बंद नहीं किया जाएगा।
लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा पर जोर
सीजेआई ने संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्थाओं की स्वायत्तता और जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से तय की गई हैं। अदालत ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि संबंधित सामग्री में पुराने भाषणों के अंशों को ऐसे प्रस्तुत किया गया, जिससे न्यायपालिका की छवि धूमिल होती है।
अदालत ने संकेत दिया कि यह केवल एक पाठ्यपुस्तक का मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ताने-बाने से जुड़ा गंभीर विषय है। अब निगाहें इस पर हैं कि जांच में क्या सामने आता है और जवाबदेही किस पर तय होती है।





