‘अंतरिक्ष में गूंजी भारत की गूंज’ जब ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने PM मोदी से शेयर किए स्पेस के अनुभव

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने देश लौटकर प्रधानमंत्री से खास मुलाकात की जहां उन्होनें अंतरिक्ष में बिताए अपने यादगार पलों और चुनौतियों को शेयर किया।

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Shubhanshu Shukla and pm modi
Shubhanshu Shukla and pm modi

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। भारत के लिए गर्व और सफलता का नया अध्याय तब लिखा गया जब अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (ISS) पर पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने अपनी यात्रा के अनुभव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ साझा किए। जुलाई में पृथ्वी पर सफलतापूर्वक लौटे शुभांशु शुक्ला ने सोमवार को पीएम आवास पर मुलाकात की, जहां उन्होंने अंतरिक्ष में बिताए गए अपने अनोखे अनुभवों और वैज्ञानिक खोजों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बातचीत की शुरुआत करते हुए पूछा, “इतनी लंबी और अनोखी यात्रा के बाद आपको कैसा महसूस हुआ? इस सवाल का जवाब देते हुए शुभांशु ने कहा कि अंतरिक्ष का वातावरण पृथ्वी से पूरी तरह अलग होता है। यहाँ गुरुत्वाकर्षण की कमी यानी माइक्रोग्रेविटी होती है, जिसके कारण शरीर और मस्तिष्क दोनों को एक नई स्थिति में खुद को ढालना पड़ता है। शुरू-शुरू में दिल की धड़कन धीमी हो गई और शरीर में बदलाव महसूस हुए। लौटने पर कदम जमीन पर रखने में भी दिक्कत हुई, क्योंकि मस्तिष्क को फिर से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के हिसाब से रिवायर करना पड़ता है।

आठ महीने तक अंतरिक्ष में जीवन: नया अध्याय

शुभांशु ने आगे बताया कि अब अंतरिक्ष यात्रियों का 8 महीने तक अंतरिक्ष में रहना सामान्य बात हो गई है। हमारे मिशन से यह सिलसिला शुरू हुआ है। इस दौरान वैज्ञानिक प्रयोग, तकनीकी परीक्षण और अंतरिक्ष अन्वेषण को नई दिशा मिली है। जो लोग इस मिशन से जुड़े थे, उनमें से कुछ इस दिसंबर में वापस लौटेंगे। लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहना कई शारीरिक और मानसिक चुनौतियों के साथ आता है, लेकिन आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षण से अब इसे संभालना संभव हो पाया है।

अंतरिक्ष में भोजन की चुनौती और भारतीय समाधान

स्पेस स्टेशन में सीमित जगह और महंगे कार्गो की वजह से भोजन का प्रबंध बड़ी चुनौती है। शुभांशु ने बताया कि यहाँ पौधों की खेती के लिए मूंग और मेथी जैसे फसलों का सफल प्रयोग किया गया है। “छोटी सी डिश में थोड़ा पानी डालकर मूंग और मेथी के बीज वहां छोड़ दिए गए। माइक्रोग्रेविटी में ये आठ दिनों में अंकुरित हो गए। यह प्रयोग न केवल स्पेस में फूड सिक्योरिटी की समस्या को सुलझाने में सहायक है, बल्कि यदि इसे पृथ्वी पर भी लागू किया जाए तो यह खाद्य सुरक्षा की बड़ी समस्या का समाधान बन सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने विज्ञान और तकनीक के प्रति बढ़ाई उम्मीदें

प्रधानमंत्री मोदी ने इस उपलब्धि पर गहरा गर्व व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में तेजी से प्रगति कर रहा है। यह हमारे युवाओं के लिए प्रेरणा है कि वे विज्ञान, तकनीक और अंतरिक्ष अनुसंधान में अपना योगदान दें। शुभांशु जी के अनुभव से हमें यह समझने का मौका मिला कि हमारी मेहनत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण किस दिशा में जा रहे हैं।”

युवाओं में अंतरिक्ष विज्ञान को लेकर नई जागरूकता

ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला के इस मिशन ने देशवासियों, खासकर युवाओं के बीच अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीक के प्रति उत्साह बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के मिशन भारत को वैश्विक अंतरिक्ष मंच पर शीर्ष स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाएंगे। साथ ही, अंतरिक्ष में खाद्य उत्पादन जैसी नवाचारी तकनीकों से धरती की भी मदद हो सकती है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शुभांशु का मिशन

शुभांशु शुक्ला का मिशन सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला भी था, जहां उन्होंने माइक्रोग्रेविटी में मानव शरीर के शारीरिक परिवर्तन, हृदय गति, मांसपेशियों की मजबूती और मस्तिष्क की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया। ये डेटा भविष्य के अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा और उनके प्रशिक्षण के लिए अमूल्य होगा।

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