नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। शिमला इस समय धार्मिक तनाव को लेकर चर्चा में है। इस तनाव का कारण शिमला के संजौली एरिया में स्थित एक मस्जिद है। हिंदू पक्ष के लोग इस मस्जिद को अवैध बता रहे हैं और उसे गिराने के लिए लगातार उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि ये मस्जिद आजादी से पहले से यहां मौजूद है।
मस्जिद समिति अवैध हिस्से को गिराने के लिए है तैयार
इसी बीच मुस्लिम समाज के लोगों ने कहा है कि वो इस मस्जिद के अवैध हिस्से को गिराने के लिए राजी हैं। इस संबंध में हिमाचल प्रदेश के पंचायती राज मंत्री अनिरूद्ध सिंह और लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने गुरुवार को जानकारी देते हुए बताया कि मस्जिद समिति के प्रतिनिधियों ने उनसे मुलाकात की है और मस्जिद के अवैध निर्माण को सील करने या गिराने पर भी सहमत हैं। इस संबंध में दोनों मंत्रियों ने संयुक्त रूप से प्रेसवार्ता कर इस मामले की जानकारी दी। इस दौरान उन्होंने कहा कि मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष मोहम्मद लतीफ़ और वक्फ़ बोर्ड के सदस्य मौलवी शेज़ाद ने शिमला नगर निगम को एक पत्र सौंपा है। जिसमें उन्होंने मस्जिद के अतिरिक्त हिस्से को गिराने पर तैयार हैं।
दोनों मंत्रियों ने BJP पर साधा निशाना
इस दौरान दोनों मंत्रियों ने BJP पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कुछ लोग इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक स्वार्थ के लिए सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वो भूल रहे हैं कि जब ये विवादित ढांचे का निर्माण हो रहा था तो उस समय उन्हीं की सरकार राज्य में थी।
वहीं मस्जिद विवाद मामले को लेकर गुरुवार को शिमला पुलिस ने शहर की पूर्व मेयर और भाजपा की महिला नेता सत्या कौंडल सहित 50 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।
कहां से शुरू हुआ विवाद?
30 अगस्त की रात मल्याणा क्षेत्र में रहने वाले यशपाल सिंह नाम के एक व्यक्ति का सैलून चलाने वाले कुछ मुस्लिम युवकों से विवाद हो गया। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार मारपीट में शामिल युवक संजौली के मस्जिद में रहते हैं और मूल रूप से यूपी के मुरादाबाद के रहने वाले हैं। पुलिस के द्वारा अभियुक्तों की जब आधार कार्ड की जांच की गई तो उनमें से अधिकांश की जन्मतिथि 1 जनवरी थी। शक होने पर स्थानीय लोगों ने 2 सितंबर को मस्जिद के पास धरना दिया और इस दौरान उन्होंने मस्जिद के अवैध निर्माण को गिराने की मांग की। इसी को लेकर 11 सितंबर को स्थानीय लोगों ने भारी प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन पर काबू पाने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा।
कैसे हाईलाइट हुआ मुद्दा?
मस्जिद विवाद का यह मुद्दा तब राष्ट्रिय चर्चा के केंद्र में आ गया जब राज्य की कांग्रेस सरकार के मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने इस मामले को विधानसभा में उठाया। जिसमें उन्होंने कहा था कि “इस मस्जिद का निर्माण बिना अनुमति के 2010 में शुरू किया गया और अबतक 2500 वर्ग फुट का अवैध निर्माण किया जा चुका है। साल 2019 तक चार अतिरिक्त मंजिल का अवैध निर्माण हो चुका था। जब केस 2010 से चल रहा था तब 2019 तक 4 मंजिलों का निर्माण कैसे हो गया?”
मालिकाना हक प्रदेश सरकार का लेकिन कब्जा वक्फ बोर्ड का
एक मीडिया संस्थान ने नगर निगम अधिकारी के हवाले से बताया है कि प्रशासन की जांच में ये पता चला है कि मस्जिद का मालिकाना हक प्रदेश सरकार का है, लेकिन इसपर कब्जा वक्फ बोर्ड का है। इस मामले में शिमला नगर निगम का 2010 से मस्जिद चलाने वाली समिति से विवाद चल रहा है। साल 2022 में इसमें वक्फ बोर्ड का नाम जोड़ दिया गया। इस मामले में नगर निगम आयुक्त की अदालत में अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को होगी।
स्थानीय लोगों की क्या है परेशानी?
मस्जिद के पास रहने वाले लोगों का कहना है कि यह मस्जिद बहुत पहले से है और यहां पर नमाज भी पढ़ी जाती है। लेकिन पिछले 5 सालों में तेजी से इस मस्जिद को 5 मंजिला बना दिया गया। इसकी वजह से इलाके में बाहर से आने वाले मुस्लिम युवकों की संख्या भी बढ़ गई है। लोगों की मांग है कि यहां अवैध निर्माण ध्वस्त होना चाहिये और हाल के दिनों में खराब हो रही कानून व्यवस्था पर लगाम लगाया जाए।





