नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के खजुराहो स्थित जवारी मंदिर में भगवान विष्णु की क्षतिग्रस्त मूर्ति को बदलने की याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने इस याचिका को ‘पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन’ यानी प्रचार पाने के उद्देश्य से दाखिल याचिका करार देते हुए सुनवाई से इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह टिप्पणी उस वक्त की, जब याचिकाकर्ता राकेश दलाल ने मंदिर परिसर में मौजूद सिरविहीन मूर्ति की जगह नई मूर्ति स्थापित करने और उसकी प्राण-प्रतिष्ठा की मांग रखी। इस पर चीफ जस्टिस ने टिप्पणी करते हुए कहा, “जाइए और अपने भगवान से कहिए कि वे चाहें तो खुद कुछ करें।”
गौरतलब है कि खजुराहो का यह मंदिर समूह यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है और मंदिर में स्थित भगवान विष्णु की लगभग सात फीट ऊँची मूर्ति वर्षों से सिरविहीन अवस्था में है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि धार्मिक भावना और परंपरा के लिहाज से प्रतिमा को बदला जाना चाहिए, लेकिन कोर्ट ने इसे जनहित के नाम पर व्यक्तिगत भावना थोपने की कोशिश बताया। अदालत ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है।
याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ?
इस मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई ने टिप्पणी की कि यह याचिका पूरी तरह से प्रचार की मंशा से प्रेरित है। उन्होंने कहा, “यह पूरी तरह से प्रचार के लिए दायर याचिका है… जाइए और अपने भगवान से कुछ करने के लिए कहिए। अगर आप कह रहे हैं कि आप भगवान विष्णु के प्रबल भक्त हैं, तो प्रार्थना कीजिए और ध्यान कीजिए।” पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला पूरी तरह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधिकार क्षेत्र में आता है और अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “यह एक पुरातात्विक स्थल है। क्या एएसआई ऐसी अनुमति देगा या नहीं… इसमें कई अन्य पहलू भी हैं।” इसके साथ ही सीजेआई गवई ने सुझाव देते हुए कहा कि, “इस बीच, अगर आप शैव धर्म के विरोधी नहीं हैं तो वहां जाकर पूजा कर सकते हैं। वहां एक विशाल शिवलिंग स्थापित है, जो खजुराहो के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है।”
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से क्या की गई मांग ?
राकेश दलाल द्वारा दाखिल की गई याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई थी कि वह खजुराहो के जवारी मंदिर में भगवान विष्णु की क्षतिग्रस्त मूर्ति को बदलने या उसके पुनर्निर्माण के लिए सरकार को निर्देश दे। याचिका में यह तर्क दिया गया कि इस संबंध में केंद्रीय गृह मंत्रालय और एएसआई को कई बार ज्ञापन सौंपे गए, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि यह मूर्ति मुगल आक्रमणों के दौरान क्षतिग्रस्त हुई थी और स्वतंत्रता प्राप्ति के 77 साल बाद भी इसे उसी स्थिति में छोड़ दिया गया है।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि खजुराहो के मंदिर मूल रूप से चंद्रवंशी राजाओं द्वारा निर्मित किए गए थे और इनका ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व अत्यधिक है। दलाल ने यह आरोप लगाया कि औपनिवेशिक काल में उपेक्षा और आजादी के बाद सरकार की निष्क्रियता, दोनों कारणों से मूर्ति की मरम्मत अब तक नहीं हो सकी। उनका यह भी तर्क था कि मूर्ति को पुनर्स्थापित करने से इनकार करना भक्तों के पूजा के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। इसके साथ ही याचिका में मंदिर से जुड़ी जनभावनाओं, विरोध प्रदर्शनों, ज्ञापनों और अभियानों का उल्लेख भी किया गया, जिनका सरकार या संबंधित संस्थाओं की ओर से कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला है।





