नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। जीएसटी डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह द्वारा अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा ने प्रशासनिक और सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। हालांकि, अब तक उनका लिखित इस्तीफा न तो शासन स्तर पर पहुंचा है और न ही राज्य कर आयुक्त कार्यालय में इसकी आधिकारिक पुष्टि हुई है। सूत्रों के मुताबिक, विभागीय अधिकारी साफ कह रहे हैं कि लिखित इस्तीफा प्राप्त होने तक आगे की किसी भी कार्रवाई पर निर्णय नहीं लिया जा सकता।
प्रशांत कुमार सिंह ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन में भावनात्मक बयान देते हुए इस्तीफे का एलान किया था। प्रशासनिक गलियारों में इसे राजनीतिक संदेश के तौर पर भी देखा गया, लेकिन उसी दिन उनके बड़े भाई डॉ. विश्वजीत सिंह ने आरोप लगाया कि प्रशांत ने फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र के सहारे नौकरी हासिल की थी।
राज्य कर आयुक्त से मांगी गई रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश शासन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य कर आयुक्त से पूरी रिपोर्ट तलब की है। इसमें प्रशांत कुमार सिंह के खिलाफ चल रही जांच, अब तक की गई विभागीय कार्रवाई, नोटिस और भविष्य की संभावित कार्रवाई शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं। शासन यह जानना चाहता है कि इस्तीफे की घोषणा किन परिस्थितियों में की गई और क्या इसका सीधा संबंध चल रही जांच से है।
फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र का आरोप
डॉ. विश्वजीत सिंह ने आरोप लगाया कि प्रशांत ने कथित रूप से फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल की। उन्होंने 20 अगस्त 2021 को इसकी औपचारिक जांच की मांग की थी। इसके बाद मंडलीय चिकित्सा परिषद ने दो बार प्रशांत को बोर्ड के सामने पेश होने के लिए बुलाया, लेकिन दोनों बार वे नहीं आए। डॉ. विश्वजीत ने यह भी बताया कि जिस आंख की बीमारी के आधार पर प्रमाणपत्र जारी किया गया, वह 50 वर्ष से पहले होना अत्यंत दुर्लभ है।
राजनीतिक और सियासी चर्चा
प्रशांत कुमार सिंह की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी चर्चा का विषय बनी हुई है। वे पहले वरिष्ठ नेता अमर सिंह की पार्टी ‘लोकमंच’ में जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। इसके बाद उन्होंने पीसीएस परीक्षा उत्तीर्ण कर सेल टैक्स विभाग में चयन पाया। उनके एक पोस्टर में भगवा बैकग्राउंड के बीच वह अटल बिहारी वाजपेई की कविता के साथ दिखाई दे रहे हैं। कहा जा रहा है कि वे भविष्य में बीजेपी टिकट के दावेदार भी थे।
इस पूरे घटनाक्रम से प्रशासनिक सुगमता, विभागीय जांच और राजनीतिक संदेश की तह तक सवाल खड़े हो रहे हैं। शासन की रिपोर्ट के आने के बाद ही आगामी कार्रवाई तय की जाएगी।





