नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के नेता राज ठाकरे के हालिया बयानों को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। बॉम्बे हाईकोर्ट के तीन वरिष्ठ वकीलों ने महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक (DGP) को पत्र लिखकर राज ठाकरे के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने और उनके कथित भड़काऊ भाषणों की गहन जांच कराने की मांग की है। साथ ही, उन्होंने ऐसे बयान देने पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत कार्रवाई की भी अपील की है।
वकीलों का तर्क है कि मराठी महाराष्ट्र की प्रादेशिक भाषा है, जिसका सम्मान करना सभी भारतीयों का कर्तव्य है। हालांकि, पिछले दिनों MNS के कार्यकर्ताओं द्वारा अन्य राज्यों के नागरिकों के साथ भाषा के नाम पर मारपीट, अपमानजनक व्यवहार और हिंसक घटनाएं हुई हैं, जो न केवल असंवैधानिक हैं बल्कि राज्य में तनावपूर्ण और अस्थिर माहौल पैदा कर रही हैं।
राज ठाकरे के भड़काऊ बयानों पर कार्रवाई की मांग
शिकायत में बताया गया है कि 5 जुलाई को मुंबई के वर्ली में हुए एक कार्यक्रम में राज ठाकरे ने ऐसा कथित बयान दिया, जिसमें उन्होंने कहा, “जो भी हमसे गलत भाषा में बात करेगा, उसे एक मिनट में चुप करा देंगे।” इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी घटनाओं को वीडियो रिकॉर्ड न किया जाए। तीन वरिष्ठ वकीलों ने आरोप लगाया है कि ये बयान न केवल कानून-व्यवस्था के लिए खतरा हैं, बल्कि ये संविधान की कई धाराओं का भी उल्लंघन करते हैं। उनका कहना है कि इस तरह के भड़काऊ भाषणों से सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचता है, इसलिए इस पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
राज ठाकरे के बयानों के बाद बढ़ा तनाव
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि राज ठाकरे के भाषण के तुरंत बाद MNS के कार्यकर्ताओं ने आक्रामक रुख अपनाया और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं पर हमला किया। उनके दफ्तरों में तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आई हैं। इन घटनाओं के संबंध में राज्य के कई हिस्सों में एफआईआर दर्ज की गई हैं। वकीलों ने आरोप लगाया है कि “मराठी भाषा” की आड़ में की जा रही ये हिंसक कार्रवाइयां न केवल राजनीतिक विद्वेष को बढ़ावा दे रही हैं, बल्कि राज्य में भाषाई आधार पर नफरत और बंटवारे की जमीन तैयार कर रही हैं। उनका कहना है कि यह स्थिति सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक ढांचे के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है।
महिलाओं और बुजुर्गों पर भी हमले के आरोप
शिकायत में यह भी कहा गया है कि एमएनएस कार्यकर्ताओं ने हालिया घटनाओं के दौरान महिलाओं और बुजुर्गों के साथ अभद्रता की, उन्हें धमकाया और शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाया। वकीलों का कहना है कि यह न केवल कानूनी प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन है, बल्कि समाज के नैतिक और मानवीय मूल्यों पर भी हमला है।
शिकायतकर्ताओं ने राज ठाकरे के बयानों को संविधान के कई महत्वपूर्ण अनुच्छेदों का उल्लंघन बताया है। जैसे- अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष सभी की समानता), अनुच्छेद 19(1)(a) (विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 19(1)(d) और (e) (भारत में कहीं भी आने-जाने और बसने की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार), और अनुच्छेद 29 (अल्पसंख्यकों की संस्कृति और हितों की सुरक्षा)। उनका तर्क है कि ऐसे बयान और उनसे प्रेरित हिंसा संविधान के मूलभूत सिद्धांतों को कमजोर करती है।
राज्य और देश की सुरक्षा पर खतरा
वकीलों ने यह दावा किया है कि राज ठाकरे के इस प्रकार के भाषण न केवल महाराष्ट्र तक सीमित हैं, बल्कि पूरे देश में नफरत और असहिष्णुता का वातावरण बना रहे हैं। उनके अनुसार, इस स्थिति से सामाजिक एकता, शांति व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि यदि इन बयानों और उनसे जुड़ी हिंसात्मक घटनाओं के खिलाफ शीघ्र और कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो इसका नकारात्मक असर आम नागरिकों की मानसिक स्थिति, व्यवसायिक गतिविधियों और शैक्षणिक माहौल पर पड़ेगा।
शिकायत में राज ठाकरे के बयानों को भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के अंतर्गत दंडनीय बताया गया है, जिनमें धारा 123(45) भाषा, जाति या धर्म के आधार पर वैमनस्य फैलाना, धारा 124 देश की एकता पर आघात, धारा 232 समाज में भय का वातावरण बनाना, धारा 345(2) समुदायों के बीच जानबूझकर दुश्मनी फैलाना, धारा 357 सार्वजनिक भय उत्पन्न करना शामिल हैं । साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) लागू करने की भी मांग की है, ताकि ऐसी गतिविधियों पर सख्त नियंत्रण सुनिश्चित किया जा सके।
राज ठाकरे पर NSA के तहत कार्रवाई की मांग
वकीलों ने इस मामले को अत्यंत गंभीर मानते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत राज ठाकरे और उनके समर्थकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि महाराष्ट्र में निवास करने वाले प्रत्येक नागरिक को भारतीय संविधान के अनुसार जीवन, स्वतंत्रता, समानता और धार्मिक अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा मिलनी चाहिए।
उनका यह भी तर्क है कि राज्य सरकार की प्रमुख जिम्मेदारी है कि वह कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए और उन तत्वों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करे जो राज्य में अशांति और नफरत का माहौल पैदा कर रहे हैं। वकीलों ने इस बात पर भी जोर दिया कि किसी भी परिस्थिति में मराठी भाषी या मुस्लिम समुदाय को जाति, धर्म या भाषा के आधार पर नुकसान न पहुंचने दिया जाए।





