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Wednesday, March 4, 2026
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राजनीतिक दलों की वेबसाइट पर नियमावली डालना होगा जरूरी? सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों की वेबसाइट पर उनकी नियमावली, मेमोरेंडम और नियमों को सार्वजनिक करने की मांग को अहम बताया है। अदालत ने इस पर चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है।

नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क।  सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों की वेबसाइट पर उनकी नियमावली, मेमोरेंडम और नियमों को सार्वजनिक करने की मांग को अहम बताया है। अदालत ने इस पर चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है। यह मामला वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका से जुड़ा है, जिन्होंने कहा है कि कई राजनीतिक दल अपने ही नियमों और मेमोरेंडम के अनुसार काम नहीं करते। इसलिए, जरूरी है कि जनता को पता चले कि दल अपने बनाए गए नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं।

क्या है याचिकाकर्ता की मांग?

अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि हर राजनीतिक दल अपनी वेबसाइट के होम पेज पर अपने मेमोरेंडम, नियम और रेग्युलेशन प्रकाशित करे। चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करे कि सभी पार्टियां अपने नियमों का पालन करें और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29A के तहत सही ढंग से रजिस्टर्ड रहें। चुनाव आयोग यह भी सुनिश्चित करे कि राजनीतिक दल चंदा लेने से जुड़ी धाराओं 29B और 29C का पालन करें। जो पार्टियां इन नियमों का उल्लंघन करें, उन पर सख्त कार्रवाई की जाए।

 कोर्ट ने क्या कहा?

सोमवार को हुई संक्षिप्त सुनवाई में जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यह मांग सार्थक है और यदि इसमें कोई कानूनी अड़चन नहीं आई, तो अदालत इस पर निर्देश जारी कर सकती है। इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने 12 सितंबर को मुख्य याचिका पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा था। उपाध्याय ने कहा कि देश में कई राजनीतिक दल केवल चंदा इकट्ठा करने या काले धन को सफेद करने के लिए बनाए जाते हैं। कई पार्टियां कभी चुनाव नहीं लड़तीं, फिर भी करोड़ों रुपये का फंड इकट्ठा करती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कानून की कमी के कारण अपराधियों और अलगाववादी विचारधारा वाले लोगों के लिए भी पार्टी बनाना आसान हो गया है।

 चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल

कोर्ट ने कहा कि अगर राजनीतिक दलों की पारदर्शिता सुनिश्चित करनी है, तो चुनाव आयोग को निगरानी और सख्त नियमों का पालन कराना होगा। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि राजनीतिक दलों को भी इस मुद्दे पर सुना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम देश में राजनीतिक दलों की जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में अहम माना जा रहा है। अब सबकी निगाहें चुनाव आयोग के जवाब पर टिकी हैं कि वह इस मामले में क्या रुख अपनाता है।

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