नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। उत्तर प्रदेश की सियासत में कांग्रेस फिर सक्रिय हो गई है। 2024 के लोकसभा चुनाव में छह सीटों की जीत ने पार्टी के हौसले बढ़ाए और अब जनवरी 2026 से फरवरी तक 17 बड़ी रैलियों का आयोजन किया जाएगा। इन रैलियों का रूट वाराणसी, गाजियाबाद, लखनऊ और अन्य प्रमुख जिलों में तय किया गया है। कांग्रेस का मकसद केवल जमीनी हालात का जायजा लेना नहीं है, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और पंचायत एवं 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए चुनावी मशीनरी को मजबूत करना भी है।
2024 के चुनावों का अनुभव
कांग्रेस ने 2024 में 17 सीटों पर चुनाव लड़ा था। छह सीटों पर जीत ने पार्टी के हौसले बुलंद किए, जबकि कई सीटों पर मामूली अंतर से हार ने भविष्य की रणनीति तय करने में मदद की। अमेठी, रायबरेली, सीतापुर, बाराबंकी, इलाहाबाद और सहारनपुर में जीत दर्ज हुई। वहीं कानपुर, झांसी, बांसगांव, फतेहपुर सीकरी, वाराणसी, देवरिया और अमरोहा में हार के बावजूद पार्टी ने मजबूत वोटबैंक बनाए रखा। इन क्षेत्रों में अब कांग्रेस ‘धन्यवाद रैलियों’ के जरिए कार्यकर्ताओं और समर्थकों को जोड़ने की योजना बना रही है।
सहारनपुर में बैठक और रणनीति का खुलासा
सहारनपुर में सांसद इमरान मसूद के आवास पर यूपी के सभी 6 सांसद और वरिष्ठ नेता जुटे। इस बैठक में तय किया गया कि रैलियों की शुरुआत 15 जनवरी के बाद होगी और अंतिम रैली फरवरी में लखनऊ में होगी। सूत्रों के अनुसार, इन रैलियों से न केवल कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया जाएगा, बल्कि जमीनी राजनीतिक हालात का भी सटीक आंकलन किया जाएगा।
सपा पर दबाव या गठबंधन की रणनीति?
विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस की यह कवायद सपा पर दबाव डालने की कोशिश के रूप में भी देखी जा रही है। 2024 में सपा के साथ गठबंधन और मुस्लिम-दलित वोटों का कांग्रेस की तरफ झुकाव यह संकेत देता है कि पार्टी अब 2027 के विधानसभा चुनावों में बड़े अवसर तलाश रही है। राहुल गांधी लगातार यूपी दौरे कर माहौल बनाए हुए हैं, और रायबरेली को अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाकर पार्टी की सक्रियता सुनिश्चित कर रहे हैं।
कांग्रेस की राजनीतिक वापसी का बड़ा दांव
कांग्रेस के लिए ये रैलियां सिर्फ जमीनी सक्रियता का जरिया नहीं हैं, बल्कि यूपी में अपनी वापसी का रणनीतिक प्रयास भी हैं। पार्टी न केवल कार्यकर्ताओं और समर्थकों को जोड़ने का काम करेगी, बल्कि आगामी चुनावों में अपनी रणनीति और गठबंधन की ताकत को भी मापेगी। अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस का यह ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ वाला दांव यूपी में उसे स्थायी पकड़ दिला पाएगा या फिर सपा और अन्य दलों के सामने यह प्रयास सीमित रह जाएगा।





