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Monday, March 2, 2026
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भाषा विवाद में कूदे पवन कल्याण, कहा-हिंदी का विरोध भी करते है और हिंदी में फिल्में डब कर मुनाफा भी कमाते हैं

भाषा विवाद में आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण भी कूद पड़े हैं। उन्होने कहा, देश को सिर्फ दो नहीं बल्कि तमिल समेत कई भाषाओं की जरूरत है।

नई दिल्‍ली/रफ्तार डेस्क। केंद्र सरकार और तमिलनाडु के बीच चल रहे भाषा विवाद में अब जनसेना पार्टी के प्रमुख और आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण भी कूद पड़े है। हाल ही में उन्‍होंने इसे लेकर एक बड़ा बयान दिया है। इस बयान में उन्‍होंने कहा कि देश को सिर्फ दो नहीं बल्कि तमिल समेत कई भाषाओं की जरूरत है। उन्होंने इस बात पर भी आश्चर्य किया कि कुछ लोग हिंदी का विरोध क्यों कर रहे हैं, ये वही लोग हैं जो फिल्मों को हिंदी में डब कर मुनाफा कमाते हैं। 

हमें भाषाई विविधता को अपनाना चाहिए-पवन कल्याण

पीथापुरम में जनसेना पार्टी के 12वें स्थापना दिवस समारोह में आयोजित एक कार्यक्रम में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कल्याण ने कहा कि ‘देश को दो नहीं, बल्कि अनेक भाषाओं की जरूरत है। हमें भाषाई विविधता को अपनाना चाहिए। सिर्फ देश की अखंडता को बनाए रखने के लिए ही नहीं, बल्कि लोगों के बीच प्रेम व एकता को बनाए रखने के लिए भी यह जरूरी है।’ गौरतलब है कि उनकी यह टिप्पणी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की ओर से केंद्र सरकार पर हिंदी थोपने के आरोपों पर के बीच आई है। यह मामला राष्ट्रीय शिक्षा नीति के त्रि-भाषा फॉर्मूले को लेकर शुरू हुआ था।

राजनेता हिंदी का विरोध क्यों करते हैं-पवन कल्याण

उन्होंने आगे कहा कि वे लोग हिंदी का विरोध करते हैं, लेकिन अपना मुनाफा कमाने के लिए तमिल फिल्मों को हिंदी में डब करने की अनुमति देते हैं। उन्होंने पूछा कि ‘मुझे समझ में नहीं आता कि कुछ लोग संस्कृत की आलोचना क्यों करते हैं। तमिलनाडु के राजनेता हिंदी का विरोध क्यों करते हैं, जबकि वित्तीय लाभ के लिए अपनी फिल्मों को हिंदी में डब करने की अनुमति देते हैं? वे बॉलीवुड से पैसा चाहते हैं, लेकिन हिंदी को स्वीकार करने से इनकार करते हैं। यह किस तरह का तर्क है?

वह स्वेच्छा से तीसरी भाषा को सीखने के लिए तैयार हैं

इससे पहले शुक्रवार को तमिलनाडु भाजपा के अध्यक्ष के अन्नमलाई ने तीन भाषा नीति पर पार्टी के रूख को दोहराते हुए कहा राज्य के लोग नहीं चाहते कि कोई भी भाषा उन पर थोपी जाए लेकिन वह स्वेच्छा से तीसरी भाषा को सीखने के लिए तैयार हैं। मुद्दा यह है कि तमिलनाडु के लोग किसी अनिवार्य तीसरी भाषा को नहीं चाहते हैं, जो कि उन पर थोपी जाए। कांग्रेस ने 1965 में यही किया था तब भी इसका विरोध हुआ था।

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