नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। भारत के गौरवशाली इतिहाल में आज का दिन काले धब्बे की तरह है। साल 2001 में यही वो दिन था जब देश की आत्मा पर कुठाराघात किया गया था। 13 दिसंबर 2001 को राजधानी दिल्ली में संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था जब पाकिस्तान से नापाक इरादे लिए 5 आतंकी संसद भवन में घुसे और ताबड़तोड फायरिंग शुरु कर दी। हमले के समय तत्कालीन गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी संसद भवन में ही मौजूद थे। उन्हें सुरक्षित कमरे में भेजकर सुरक्षाकर्मियों ने जवाबी फायरिंग करनी शुरु कर दी। दुखद यह था कि इस हमले में देश के 20 जाबांज शहीद हो गए थे।
कैसे खून से लाल हो गया था संसद भवन
हमले के दिन सुबह 11:30 बजे सफेद रंग की एंबेसडर कार सुरक्षाकर्मियों के चकमा देते हुए संसद भवन परिसर में घुसी। कार पर जब सुरक्षाकर्मियों को शक हुआ तो उसकी छानबीन करने की कोशिश की गई। जैसै ही सुरक्षाकर्मी कार के पास पहुंचे तो आतंकियो ने उपराष्ट्रपति की गाड़ी ठोक दी। इसके बाद उन्होने आव देखा न ताव ताबड़तोड गोलीबारी शुरु कर दी। दोनों ओर से यह कार्यवाई 45 मिनट तक चली। दूसरी तरफ सदन में मौजूद 200 सांसदों की सुरक्षा को भी सुनिश्चित करना था। इस ऑपरेशन में 5 आतंकियो को मौत के घाट उतार दिया गया। जबकि 8 जवान भी शहीद हो गए। ऑपरेशन खत्म होने पर कार की जांच की गई तो कार से करीब 30 किलो RDX बरामद हुआ।
पाकिस्तान था संसद हमले का मास्टरमाइंड
हमले को गंभीरता से लिया, लिया भी जाना चाहिए था। जांच में सामने आया कि पाकिस्तान की कोख से जन्मा आतंकी अफजल गुरु इस मामले का मास्टरमाइंड था। भारतीय एजेंसियों ने अफजल गुरु, दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एसआर गिलानी समेत 4 लोगों को अपने शिंकजे मे ले लिया। साल 2013 तक इस मामले की कार्यवाई कोर्ट में चली। फिर 9 फरवरी 2013 को वो मौका आया जब अफजल गुरु को उसके कुकर्मों की सजा दे दी गई। उसे फांसी पर लटका दिया गया। उसके साथी शौकत हुसैन गुरु को भी 10 साल के लिए सालाखों के पीछे डाल दिया गया था।





