नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क । केंद्र सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण में बड़े बदलाव के मूड में नजर आ रही है। केंद्र की मोदी सरकार ओबीसी श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ उठाने वाले क्रीमी लेयर के इनकम की सीमा में एक समानता लाने के प्रस्ताव पर मंथन कर रही है। इसके लिए सरकार एक बड़ा कदम उठाने जा रही है।
मिली जानकारी के अुनसार, केंद्र सरकार ‘क्रीमी लेयर’ इनकम की सीमा और मानदंड को विभिन्न केंद्रीय और राज्य सरकारी संगठनों, सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs), विश्वविद्यालयों और निजी संस्थानों में भी लागू करने पर मंथन कर रही है। इसके पीछे सरकार का मकसद इन सभी क्षेत्रों में एक ‘समानता’ लाई जा सके।
क्रीमी लेयर को लेकर बड़े बदलाव की तैयारी में सरकार
दरअसल, सरकार मौजूदा समय में अन्य पिछड़ा वर्ग ‘क्रीमी लेयर’ की सीमा बढ़ाकर नए मानदंड लागू करना चाहती है, ताकि ओबीसी आरक्षण का लाभ समाज के अति-पिछड़े ओर पिछड़े वर्ग के लोगों तक पहुंच सके। और इस समुदाय के संपन्न या उच्च पदों पर मौजूद लोगों को इससे बाहर किया जा सके।
एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक, रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया कि इस मसले पर सामाजिक न्याय और शिक्षा, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT), कानूनी-विधि, श्रम व रोजगार, सार्वजनिक उपक्रम, नीति आयोग और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) के बीच कई बार चर्चा और बातचीत हुई है, जिसके बाद यह प्रस्ताव तैयार किया गया है।
क्या है क्रीमी लेयर, कब हुआ था लागू?
ओबीसी आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट एक ऐतिहासिक फैसले से हुई थी। यह केस इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार से जुड़ा था।आपको बता दें कि,1992 के सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक निर्णय इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार (मंडल फैसला) में OBC के भीतर ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा लागू हुई थी। तब उस दौरान, क्रीमी लेयर की सीमा सालाना आय 1 लाख रुपये तय की गई थी। हालांकि, इसके बाद से इसमें कई बार बदलाव हो चुका है। और इसे साल 2017 में बढ़ाकर 8 लाख रुपये कर दिया गया। यह अभी भी लागू है।
‘क्रीमी लेयर’ में कौन लोग शामिल?
ओबीसी आरक्षण ‘क्रीमी लेयर’ के दायरे में आने वालों में संवैधानिक पदों पर बैठे लोग, मौजूद अफसर, केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी, ऑल इंडिया सर्विसेज के ग्रुप-A/क्लास-I और ग्रुप-B/क्लास-II अधिकारी, PSU कर्मचारी, सशस्त्र बलों के अफसर, बड़े व्यापारी-उद्योगपति और संपत्ति या जो भी आय की निर्धारित सीमा में आते हैं।
क्रीमी लेयर में क्यों जरूरी है समानता?
कई केंद्रीय PSU में 2017 में क्रीमी लेयर के नियम सख्ती से लागू किए गए। उनमे समानता तय की गई थी, लेकिन प्राइवेट सेक्टर, विश्वविद्यालयों और राज्यों के विभागों में यह अभी तक यह लागू नही किया गया। सूत्रों के अनुसार, विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर की सैलरी लेवल-10 या उससे ऊपर होती है, जो सरकारी ग्रुप-A पदों के बराबर है। ऐसे में इन्हें ‘क्रीमी लेयर’ में लाने का प्रस्ताव है। इसका मतलब है कि इनके बच्चे ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं ले पाएंगे।
सरकार ने नए प्रस्ताव में क्या-क्या जोड़ा?
वहीं, अब नए प्रस्ताव के तहत विश्वविद्यालयों के असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर जैसे पदों को ग्रुप-ए के समकक्ष मानते हुए ‘क्रीमी लेयर’ में रखा जा सकता है, जिससे उनके बच्चों को ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। निजी क्षेत्र में ‘क्रीमी लेयर’ का निर्धारण आय/संपत्ति के आधार पर किया जाएगा।
राज्य PSU के मैनेजमेंट और बोर्ड-स्तरीय पदों को भी ‘क्रीमी लेयर’ में शामिल किया जाएगा। हालांकि, जिनकी आय 8 लाख रुपये से कम होगी, उन्हें इससे बाहर रखा जाएगा।
बता दें कि, इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में कई मामले लंबे समय से लंबित हैं। सरकार का कहना है कि स्पष्ट नियम बनने से समस्या खत्म होगी। और ओबीसी को रोजगार में ज्यादा अवसर मिलेंगे।




