नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के सहयोगी दलों ने अपनी राजनीतिक ताकत दिखानी शुरू कर दी है। दिल्ली में हुए निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में सुभासपा अध्यक्ष ओपी राजभर, अपना दल (एस) के उपाध्यक्ष आशीष पटेल और निषाद पार्टी प्रमुख संजय निषाद ने जिस तरह से एकजुटता दिखाई, उससे यह साफ है कि इनकी नजर विपक्ष पर कम और भाजपा से सीटों की हिस्सेदारी बढ़ाने पर ज्यादा है। इन सहयोगी दलों का असली मकसद अखिलेश यादव के PDA गठजोड़ को तोड़ना नहीं, बल्कि 2026 के पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव में अपनी भूमिका को मजबूत करना है। इस एकजुटता के जरिए भाजपा को यह संदेश दिया गया है कि अब सहयोगी दल सिर्फ समर्थन देने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि निर्णायक हिस्सेदारी की मांग करेंगे।
UP चुनाव से पहले जातीय दलों की सक्रियता बढ़ी
ऐसा पहली बार नहीं है कि पिछड़ों के हक की बात कर रहे जातीय राजनीति करने वाले नेता चुनाव से पहले सक्रिय हो गए हैं। हर चुनाव से पहले इस तरह के मुद्दे उठाकर ये नेता न सिर्फ अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश करते हैं, बल्कि सरकार में हिस्सेदारी भी पाते रहे हैं। एनडीए में शामिल अपना दल (एस), सुभासपा और निषाद पार्टी के नेता भले ही विपक्ष को पिछड़ों की अनदेखी का जिम्मेदार ठहरा रहे हों, लेकिन असली निशाना आगामी बिहार विधानसभा चुनाव, यूपी पंचायत चुनाव और 2027 विधानसभा चुनाव में सीटों की सौदेबाजी में अपनी ताकत बढ़ाना है। यानी इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का केंद्र जातीय गोलबंदी के जरिए भाजपा पर दबाव बनाना है, ताकि सीटों में ज्यादा हिस्सेदारी सुनिश्चित की जा सके।
दिल्ली में अधिवेशन : सिर्फ मंच नहीं, बीजेपी को सियासी संदेश भी
दिल्ली में हुए निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन को महज एक आयोजन नहीं, बल्कि भाजपा को रणनीतिक दबाव में लेने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल (एस) जैसे एनडीए घटक दलों ने मंच से आरक्षण विरोधियों को चेतावनी देकर अपनी एकजुटता का सार्वजनिक प्रदर्शन किया और यह सब बिल्कुल यूं ही नहीं हुआ। इनका मकसद साफ है कि बिहार विधानसभा चुनाव (नवंबर 2025) और यूपी पंचायत चुनाव (2026) में सीटों की मांग को मजबूत आधार देना। जहां राजभर और निषाद पहले ही बिहार में हिस्सेदारी की मांग उठा चुके हैं, वहीं अधिवेशन में बिहार में निषाद पार्टी के चुनाव लड़ने का एलान यह जाहिर करता है कि तीनों दलों की यह एकता दरअसल भाजपा पर दबाव बनाने की रणनीति है। ऐसे में दिल्ली को अधिवेशन का मंच बनाना भी एक सोची-समझी राजनीतिक चाल थी ताकि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व तक यह संदेश सीधे और तेजी से पहुंचे कि सहयोगी दल सिर्फ साथ देने नहीं, हिस्सेदारी तय कराने भी आए हैं।




