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नवजागरण के पुरोधा पत्रकार थे माधवराव सप्रे : सचदेव

वर्धा, 20 जून (हि.स.)। माधवराव सप्रे ने लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के मराठी में निकलने वाले केसरी समाचार पत्र को हिंदी केसरी के माध्यम से व्यापक फलक प्रदान किया। उन्होंने स्वाधीनता को लेकर तिलक के उग्र विचारों को हिंदी भाषी लोगों के बीच प्रचारित किया। वे नवजागरण के पुरोधा पत्रकार थे। यह उद्गार वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ सचदेव ने ‘माधव राव सप्रे की राष्ट्र-चेतना’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में व्यक्त किए। महाराष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग की ओर से माधव राव सप्रे की 150वीं जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार सचदेव ने पराधीन भारत में नवजागरण के लिए हिंदी केसरी के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हिंदी क्षेत्र में नवजागरण का कार्य सप्रेजी ने किया और उन्होंने देश को आंदोलित करने में बड़ी भूमिका निभाई। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल ने की। प्रो. शुक्ल ने कहा कि माधवराव सप्रे भारतीयता के भाष्यकार और भारत बोध के पत्रकार थे। भले ही हिंदी केसरी की उम्र छोटी थी परंतु प्रभाव व्यापक था। सप्रेजी ने मराठी से हिंदी में अनुवाद कर भाषा- सेतु के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सप्रेजी आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित एक नई सभ्यता निर्मित करने वाले अनन्यतम पत्रकार थे। संगोष्ठी को नई दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि सप्रेजी ने अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ अलग-अलग नामों से प्रभावी लेखन किया। वे तिलक के वैचारिक उत्तराधिकारी थे। उन्होंने तिलक के स्वदेशी आंदोलन को हिंदी क्षेत्र में फैलाया। सप्रेजी ने स्वाधीनता के समय नागपुर से हिंदी ग्रंथमाला प्रारंभ कर स्वराज की स्थापना के लिए संघर्ष किया। उल्लेखनीय है कि 19 जून 1871 को मध्य प्रदेश के दमोह जिले में जन्मे माधवराव सप्रे एक कुशल संपादक, प्रकाशक, शिक्षक और निबंधकार थे। वह सिर्फ 54 साल जिए किंतु जिस तरह उन्होंने अनेक सामाजिक संस्थाओं की स्थापना की, पत्र-पत्रिकाएं संपादित कीं, वह विलक्षण है। लोकमान्य तिलक के कार्यों से प्रभावित सप्रेजी ने 13 अप्रैल 1907 से हिंदी केसरी का प्रकाशन आरंभ किया। 23 अप्रैल 1926 को उनका निधन हो गया। 26 वर्षों की अपनी पत्रकारिता और साहित्य सेवा के दौर में उन्होंने कई मानक रचे। हिन्दुस्थान समाचार/सुधांशु

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