नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। लोक अदालत का फैसला आमतौर पर अंतिम माना जाता है, क्योंकि यह दोनों पक्षों की सहमति से होता है। हालांकि कुछ खास परिस्थितियों में हाई कोर्ट में रिट याचिका के जरिए इसे चुनौती दी जा सकती है। देश की अदालतों में लाखों-करोड़ों मामले लंबे समय से लंबित हैं। ऐसे में लोगों को जल्दी और सस्ता न्याय दिलाने के लिए लोक अदालत एक अहम व्यवस्था मानी जाती है। यहां विवादों का समाधान आपसी समझौते के जरिए किया जाता है, जिससे समय और पैसा दोनों की बचत होती है। लोक अदालत में अक्सर बैंक लोन, बिजली बिल, ट्रैफिक चालान, पारिवारिक विवाद और छोटे सिविल मामलों का निपटारा आसानी से किया जाता है।
लोक अदालत के फैसले की कानूनी स्थिति
कानून के अनुसार लोक अदालत द्वारा दिया गया फैसला सिविल कोर्ट की डिक्री के बराबर माना जाता है। इसकी सबसे खास बात यह है कि यह फैसला दोनों पक्षों की सहमति से होता है। इसी वजह से आमतौर पर इसके खिलाफ किसी भी उच्च अदालत, जैसे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में सीधी अपील नहीं की जा सकती। इसका उद्देश्य यही है कि विवाद का अंतिम और स्थायी समाधान हो सके।
क्या हाई कोर्ट में चुनौती देना संभव है?
हालांकि लोक अदालत के फैसले के खिलाफ सीधी अपील का प्रावधान नहीं है, लेकिन कुछ खास परिस्थितियों में इसे चुनौती दी जा सकती है। अगर किसी पक्ष को लगता है कि फैसला धोखाधड़ी से लिया गया है किसी पर दबाव डालकर समझौता कराया गया है या कानूनी प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन हुआ है तो वह संविधान के अनुच्छेद 226 या 227 के तहत हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर सकता है। लेकिन यह सामान्य अपील नहीं होती, बल्कि केवल असाधारण मामलों में ही अदालत इसे सुनती है।
कौन से मामले लोक अदालत में नहीं सुने जाते?
लोक अदालत की अपनी सीमाएं भी हैं। हर तरह के विवाद यहां नहीं सुलझाए जा सकते। इन मामलों की सुनवाई लोक अदालत में नहीं होती गैर-शमनीय (Non-Compoundable) आपराधिक मामले हत्या, बलात्कार, डकैती जैसे गंभीर अपराध ऐसे विवाद जिनमें दोनों पक्ष समझौते के लिए तैयार न हों कुछ गंभीर पारिवारिक विवाद जैसे तलाक से जुड़े जटिल मामले इन मामलों में सामान्य अदालतों में ही सुनवाई होती है।
लोक अदालत में केस ले जाने के फायदे
लोक अदालत को आम लोगों के लिए काफी आसान और सस्ता मंच माना जाता है। इसके कई फायदे हैं यहां कोई कोर्ट फीस नहीं लगती पहले से जमा कोर्ट फीस भी वापस मिल सकती है। मामलों का जल्दी निपटारा होता है सख्त कानूनी प्रक्रियाओं की बजाय बातचीत और समझौते पर जोर दिया जाता है यही वजह है कि हर साल देशभर में लाखों मामले लोक अदालत के जरिए सुलझाए जाते हैं।





