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भाषाओं से जुड़े विवाद में खंड-खंड बंट गया है झारखंड

रांची, 17 अप्रैल (आईएएनएस)। भाषाओं से जुड़े विवाद में झारखंड इन दिनों खंड-खंड बंटा हुआ है। आप हैरान हो सकते हैं, लेकिन यह सच है कि 79,714 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और तकरीबन साढ़े तीन करोड़ की आबादी वाले इस छोटे से प्रदेश में एक-दो नहीं, सात-आठ भाषाओं को लेकर अलग-अलग तरीके के विवाद हैं। मुख्य तौर पर हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मगही, मैथिली, अंगिका, भोजपुरी को लेकर उठे विवादों के बीच पिछले आठ-नौ महीनों में पूरे राज्य में कई धरना-प्रदर्शन तो हुए ही, विधानसभा में भी सवाल-जवाब का सिलसिला चला। इन विवादों से जुड़े मामले अदालत में भी पहुंचे हैं, जिनपर सुनवाई जारी है। दरअसल झारखंड में अलग राज्य के निर्माण के साथ ही क्षेत्रीयता का मसला बेहद अहम रहा है। भाषाओं के विवाद के पीछे भी मूल वजह यही है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सितंबर 2021 में एक इंटरव्यू में तल्ख अंदाज में कहा था कि भोजपुरी और मगही जैसी भाषाएं मूलत: बिहार की हैं। इन्हें हम झारखंड की क्षेत्रीय भाषा नहीं मान सकते। मुख्यमंत्री के वीडियो इंटरव्यू की क्लिपिंग पूरे राज्य में खूब वायरल हुए थी। इसमें उन्होंने कहा था, भोजपुरी बोलने वाले लोग डोमिनेटिंग हैं। हम भूल नहीं सकते कि इन लोगों ने झारखंड आंदोलन के दौरान यहां के आंदोलनकारियों को किस तरह गालियां दी और मां-बहनों से अपमानजनक व्यवहार किया। ऐसे में हम इन्हें क्षेत्रीय भाषाओं का दर्जा कैसे दे सकते हैं। सीएम के इस बयान के पक्ष-विपक्ष में जमकर सियासी बयानबाजियां हुईं। भाजपा ने इसे विद्वेष फैलानेवाला बयान बताते हुए विरोध जताया तो झारखंड मुक्ति मोर्चा और आदिवासी संगठनों ने सीएम के स्टैंड को वाजिब ठहराया। इस बयान पर सरकार में साझीदार कांग्रेस के कई नेता-मंत्री खासे असहज हुए। कांग्रेस के विधायकों में कई भोजपुरी भाषी हैं। कुछ विधायक ऐसे क्षेत्रों से जीतकर आये हैं, जहां भोजपुरी, मगही, अंगिका, मैथिली बोलनेवालों की खासी तादाद है। कांग्रेस ने सीएम के इस बयान से किनारा करने की कोशिश की। जमशेदपुर के विधायक और हेमंत सोरेन की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने भोजपुरी के पक्ष में बयान दिया और यहां तक कह दिया कि जिस दिन मुझे लगेगा कि मातृभाषा पर आंच आ रही है, तो मैं बिना सोचे तुरंत इस्तीफा दे दूंगा। बाद में 23 दिसंबर 2021 को सरकार ने झारखंड राज्य कर्मचारी आयोग चयन (जेएसएससी) की ओर से ली जानेवाली नियुक्ति परीक्षाओं की नियमावली को लेकर नोटिफिकेशन जारी किया तो भाषा विवाद एक बार फिर तेज हो गया। सरकार की पॉलिसी के अनुसार जेएसएससी की ओर से थर्ड एवं फोर्थ ग्रेड पदों पर नियुक्ति के लिए परीक्षाएं दो अलग-अलग स्तरों पर ली जायेंगी। पहली राज्य स्तरीय और दूसरी जिलास्तरीय। राज्यस्तरीय थर्ड एवं फोर्थ ग्रेड वाली नौकरियों की परीक्षाओं के लिए क्षेत्रीय भाषाओं की सूची से मगही, मैथिली, भोजपुरी और अंगिका को बाहर रखा गया है। दूसरी तरफ जिलास्तरीय थर्ड एवं फोर्थ ग्रेड नौकरियों के लिए जिला स्तर पर क्षेत्रीय भाषाओं की अलग सूची है, जिसमें कुछ जिलों में भोजपुरी, मगही और अंगिका को शामिल रखा गया है। इस नोटिफिकेशन में कुछ जिलों में क्षेत्रीय भाषाओं की सूची में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका को शामिल करने पर एतराज जताते हुए कई आदिवासी-मूलवासी संगठन सड़क पर उतर आये। विरोध के चलते राज्य सरकार को धनबाद और बोकारो जिले में क्षेत्रीय भाषाओं की सूची संशोधित करनी पड़ी। 18 फरवरी को संशोधित नोटिफिकेशन जारी कर बोकारो और धनबाद जि़लों की क्षेत्रीय भाषाओं की सूची से भोजपुरी और मगही को बाहर कर दिया गया। जाहिर है, इस संशोधित नोटिफिकेशन के बाद भोजपुरी और मगही भाषी लोग नाराज हैं। राज्य के गोड्डा जिले में क्षेत्रीय भाषाओं की सूची में कुरमाली को शामिल न किये जाने पर एक अलग विवाद है। गोड्डा के विधायक अमित मंडल और महगामा की कांग्रेस विधायक दीपिका पांडेय ने विधानसभा के बीते सत्र में इसपर जोरदार विरोध दर्ज कराया था। इस मुद्दे पर गोड्डा जिले में प्रदर्शन भी हुए हैं। विवाद उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी को लेकर भी है। सरकार ने नियुक्ति नियमावली में उर्दू को राज्य के सभी 24 जिलों में क्षेत्रीय भाषा का दर्जा दिया है, जबकि परीक्षाओं के लिए लैंग्वेज पेपर में हिंदी और अंग्रेजी को शामिल नहीं किया है। भारतीय जनता पार्टी का सवाल है कि राज्य के सभी 24 जिलों में उर्दू को क्षेत्रीय भाषा का दर्जा देने का क्या आधार है? भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव कहते हैं कि यह तुष्टिकरण की नीति है कि उर्दू को क्षेत्रीय भाषा बना दिया गया और हिंदी को बाहर कर दिया। क्या राज्य में हिंदी बोलने वाले नहीं हैं? इनके साथ अन्याय क्यों? इधर हिंदी-अंग्रेजी को जेएसएससी की नियुक्ति परीक्षाओं में लैंग्वेज पेपर से हटाये जाने के सरकार के निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी है। प्रार्थी रमेश हांसदा और विकास कुमार चौबे की ओर से दायर याचिका पर बीते 6 अप्रैल को सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि आखिर किस आधार पर हिंदी और अंग्रेजी को लैंग्वेज पेपर से बाहर किया गया? अदालत ने कहा कि यह बेहद गंभीर मामला है और इसे लंबे समय तक नहीं लंबित रखा जा सकता। इस मामले में अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होनी है। भाषा के मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस के भितरखाने भी दिल बंटे हुए हैं। यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस ने राज्य में क्षेत्रीय भाषाओं के मुद्दे पर अपना स्टैंड अब तक साफ नहीं किया है। –आईएएनएस एसएनसी/एसकेपी

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