नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत असम की डिब्रूगढ़ जेल में बंद पंजाब की खंडूर साहिब लोकसभा सीट से सांसद अमृतपाल सिंह 9 सितंबर को होने वाले उपराष्ट्रपति चुनाव में मतदान करेंगे। चुनाव आयोग ने उन्हें डाक मतपत्र के माध्यम से वोट डालने की अनुमति दी है। दरअसल, यह कदम संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है, ताकि जेल में बंद सांसद भी अपने सांसद के पद के नाते अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें। चुनाव आयोग के इस कदम को संवैधानिक व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
अमृतपाल सिंह को मिलेगा मतदान का अधिकार, आयोग ने दिए निर्देश
अमृतपाल फिलहाल असम की डिब्रूगढ़ जेल में NSA के तहत बंद हैं, लेकिन आयोग ने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव नियम, 1974 के नियम 26 का हवाला देते हुए उन्हें डाक मतपत्र के जरिए वोट देने की सुविधा देने का आदेश दिया है। पंजाब के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय से जारी बयान के अनुसार, नियमों के तहत निवारक हिरासत में बंद सांसदों को मतदान का अधिकार है। हालांकि, डाक मतपत्र केवल मतदान के दिन ही जारी किया जा सकता है और इस बार भी यही प्रक्रिया अपनाई जाएगी। चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि अमृतपाल सिंह का मतदान अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रहेगा और उनका वोट अन्य सांसदों की तरह ही वैध माना जाएगा।
डाक मतपत्र से कैसे करेंगे वोट अमृतपाल सिंह?
निर्धारित प्रक्रिया के तहत, सांसद अमृतपाल सिंह को मतदान के दिन ही डाक मतपत्र दिया जायेगा। मतपत्र मिलने के बाद वह उसे भरकर एक सीलबंद लिफाफे में डालेंगे, जिसे निर्धारित समय सीमा के भीतर मतदान केंद्र तक पहुंचाना अनिवार्य होगा। चुनाव आयोग ने इस पूरी व्यवस्था को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए गृह मंत्रालय और असम सरकार के मुख्य सचिव को विशेष निर्देश जारी किए हैं। आयोग ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि मतपत्र को हवाई मार्ग से डिब्रूगढ़ से भेजा जाए, ताकि यह 9 सितंबर की शाम 6 बजे से पहले रिटर्निंग ऑफिसर के पास पहुंच जाए। उसी के बाद मतगणना की प्रक्रिया शुरू होगी।
अमृतपाल को मिला विशेष संवैधानिक प्रावधानों का लाभ
अमृतपाल सिंह अभी असम की डिब्रूगढ़ केंद्रीय जेल में बंद हैं। उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 के तहत कार्रवाई की गई थी। आम परिस्थितियों में जेल में बंद व्यक्ति को मतदान की अनुमति नहीं होती, लेकिन सांसद होने के नाते उन्हें विशेष संवैधानिक प्रावधानों का लाभ दिया गया है। इस निर्णय को लोकतंत्र को मजबूत करने वाले कदम के तौर पर देखा जा रहा है। चुनाव आयोग के निर्देश के बाद उन्हें उपराष्ट्रपति चुनाव में मतदान की अनुमति दी गई है, जिससे यह संदेश गया है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि का अधिकार परिस्थितियों से परे होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसी ही अन्य स्थितियों में एक उदाहरण बन सकता है, जहां जनप्रतिनिधियों को हिरासत में रहते हुए भी मतदान का अवसर देना जरूरी हो सकता है।





