चेन्नई, 25 अक्टूबर (आईएएनएस)। भाषाई विवाद को लेकर नया बखेड़ा आईसीएआई के अध्यक्ष निहार एन. जंबुसरिया पर लगा है। उन्होंने एक क्षेत्रीय भाषा को दूसरे के खिलाफ खड़ा करके भाषाई विवाद को फिर से शुरू कर दिया है। जब इसने तूल पकड़ना शुरू किया तो इस दौरान, सदस्यों ने जंबुसरिया को याद दिलाया कि वह इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आईसीएआई) का नेतृत्व कर रहे हैं, न कि इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ नॉर्थ इंडिया का नेतृत्व कर रहे हैं। सदस्यों को अपने मासिक संदेश में, जंबुसरिया ने कहा, हमारी मातृभाषा हिंदी की शक्ति को महसूस करते हुए, आईसीएआई (भारतीय चार्टर्ड एकाउंटेंट्स संस्थान) अपनी कार्य संस्कृति में हिंदी के अधिक उपयोग को शामिल करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने अक्टूबर के लिए अपने अध्यक्ष के संदेश में आईसीएआई के लगभग तीन लाख सदस्यों को बताया, सदस्यों को अपने काम और अन्य हितधारकों के साथ बातचीत में हिंदी भाषा को अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जंबुसरिया ने कहा, ऐसे समय में जब पूरी दुनिया भारत को एक वैश्विक नेता, उत्तराधिकारी के रूप में देख रही है, हमारी भाषा भी एक वैश्विक प्रकाशस्तंभ होनी चाहिए। जंबुसरिया की हिंदी भाषा के लिए प्रेम को लेकर कई चार्टर्ड एकाउंटेंट ने चिंता व्यक्त की है। ऐसे विचारों का कड़ा विरोध करते हुए सोसायटी ऑफ ऑडिटर्स के अध्यक्ष प्रभाकर ने आईएएनएस से कहा, आईसीएआई के अध्यक्ष ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को अपने मासिक संदेश में हिंदी भाषा के प्रचार का संदेश देकर बेवजह का विवाद पैदा किया है। मैं सच में नहीं जानता हूं कि वह किसे खुश करने की कोशिश कर रहे हैं। प्रभाकर ने कहा कि जंबुसरिया का प्रयास विविधता में एकता की अवधारणा का उपहास करना है, जिसके बारे में कई राष्ट्रीय नेताओं ने बात की है। प्रभाकर ने कहा, मुझे आश्चर्य है कि अगर उन्हें पता चलता है कि वह जिस संस्थान का नेतृत्व कर रहे हैं, वह आईसीएआई है, न कि आईसीएएनआई, जिसमें एन उत्तर के लिए है। हमें उम्मीद है कि जंबुसरिया अपनी टिप्पणी वापस ले लेंगे। द्रमुक सांसद और प्रवक्ता टी.के.एस. एलंगोवन ने आईएएनएस से कहा, अनेकता में एकता भारत की पहचान है जिसका हम समर्थन करते हैं। अगर भारत की वैश्विक पहचान के लिए भारतीय भाषा की जरूरत है, तो तमिल सबसे उपयुक्त है। उन्होंने कहा, तमिल दुनिया की सबसे पुरानी भाषाओं में से एक है। यह श्रीलंका, सिंगापुर और भारत में आधिकारिक भाषा है। इसे शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त है और यह साहित्य में समृद्ध है। उन्होंने कहा कि यह सच हो सकता है कि भारत में बड़ी संख्या में लोग हिंदी बोलते हैं ,लेकिन यह भी उतना ही सच है कि हिंदी नहीं बोलने वालों की संख्या अधिक है। –आईएएनएस आरएचए/आरजेएस




