नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। भारत में चुनावी व्यवस्था को संतुलित और निष्पक्ष बनाए रखने के लिए समय-समय पर लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाएं बदली जाती हैं। इस प्रक्रिया को परिसीमन कहा जाता है और इसे लागू करने का काम परिसीमन आयोग करता है। हाल ही में 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों के पुनर्निर्धारण की चर्चा तेज हो गई है।
क्या होता है परिसीमन?
परिसीमन का मतलब है चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं तय करना। जब किसी क्षेत्र की आबादी बढ़ती या घटती है, तो यह जरूरी हो जाता है कि सीटों का बंटवारा संतुलित रहे। ताकि हर क्षेत्र को बराबर प्रतिनिधित्व मिल सके।
कैसे बनता है परिसीमन आयोग?
परिसीमन आयोग कोई स्थायी संस्था नहीं है। इसे जरूरत के अनुसार बनाया जाता है। Article 82 of Indian Constitution के तहत संसद कानून बनाती है। इसके बाद राष्ट्रपति आयोग का गठन करते हैं आयोग में शामिल होते हैं: सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज (अध्यक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त या उनके प्रतिनिधि राज्यों के चुनाव आयुक्त इस संरचना का उद्देश्य है कि फैसले निष्पक्ष और पारदर्शी हों।
क्यों नहीं दी जा सकती कोर्ट में चुनौती?
परिसीमन आयोग के फैसलों को खास दर्जा दिया गया है। Article 329(a) of Indian Constitution के तहत अदालतों का हस्तक्षेप रोका गया है आयोग की रिपोर्ट गजट में प्रकाशित होते ही कानून बन जाती है इसलिए Supreme Court of India भी सामान्य तौर पर इसमें दखल नहीं दे सकता।
ऐसा क्यों किया गया?
अगर हर फैसले पर कोर्ट में केस होने लगे, तो चुनाव प्रक्रिया में भारी देरी हो सकती है। चुनाव समय पर नहीं हो पाएंगे सीटों को लेकर विवाद बढ़ेंगे लोकतंत्र प्रभावित होगा इसी वजह से आयोग के फैसलों को अंतिम माना गया है। हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि अगर कोई फैसला पूरी तरह मनमाना हो या संविधान के खिलाफ हो, तो उसकी सीमित समीक्षा की जा सकती है। लेकिन सामान्य स्थिति में आयोग का फैसला ही अंतिम माना जाता है। परिसीमन आयोग भारत की चुनावी प्रणाली का एक अहम स्तंभ है। इसकी स्वतंत्रता और शक्तियां यह सुनिश्चित करती हैं कि देश में चुनाव निष्पक्ष और समय पर हो सकें। यही वजह है कि इसके फैसलों को विशेष संवैधानिक सुरक्षा दी गई है।




