नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में रहने वाले मूल निवासी हिंदुओं को हथियार लाइसेंस देने की योजना को सही ठहराया। उनका कहना है कि इन समुदायों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया जा रहा है, खासकर दक्षिण सलमारा, मनकाचर और भागबर जैसे जिलों में। मुख्यमंत्री के इस बयान से राजनीतिक माहौल फिर गरमा सकता है, क्योंकि असम में पिछले कुछ महीनों से लाइसेंस पॉलिसी को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
“सनातन धर्म की रक्षा हमारा कर्तव्य”
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यक बहुल जिलों में रहने वाले सनातन धर्मावलंबियों को कानूनी प्रक्रिया के तहत हथियार के लाइसेंस दिए जा सकते हैं। उन्होंने कहा, “असम में कुछ ऐसे गांव हैं, जहां 30,000 की आबादी में केवल 100 सनातनी हिंदू रहते हैं। ऐसे में अगर वे सुरक्षा के लिए आवेदन करते हैं, तो उन्हें कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत हथियार रखने की अनुमति दी जा सकती है।” सीएम सरमा ने जोर देकर कहा, “सनातन धर्म की रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है।” गौरतलब है कि 28 मई 2025 को असम कैबिनेट ने एक अहम निर्णय लेते हुए असुरक्षित और दूरदराज इलाकों में रहने वाले मूल निवासियों को आत्म-सुरक्षा के उद्देश्य से हथियार लाइसेंस देने की मंजूरी दी थी।
भारत में बंदूक का लाइसेंस पाना आसान नहीं, जानिए क्या है प्रक्रिया?
भारत में आम नागरिकों के लिए हथियार का लाइसेंस लेना कोई सरल काम नहीं है। यह पूरी प्रक्रिया 1959 के शस्त्र अधिनियम (Arms Act) के अधीन आती है। इस कानून के तहत नागरिकों को केवल नॉन-प्रोहिबिटेड बोर (NPB) श्रेणी की बंदूकें रखने की अनुमति होती है। हालांकि, अधिनियम में यह प्रावधान है कि अगर किसी व्यक्ति को गंभीर खतरे की आशंका है, तो वह हथियार लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकता है। लेकिन असली चुनौती यह है कि व्यक्ति को यह साबित करना होता है कि उसकी जान को खतरा है।
आमतौर पर इसके लिए किसी हमले या धमकी की FIR दर्ज कराना पर्याप्त माना जाता है, लेकिन अधिकारियों को यह भी देखना होता है कि खतरा वास्तविक और गंभीर है या नहीं। इसके बावजूद, भारत में हथियार लाइसेंस की प्रक्रिया बहुत ही लंबी, सख्त और समय लेने वाली होती है।
कैसे मिलता है बंदूक का लाइसेंस?
भारत में बंदूक का लाइसेंस प्राप्त करना एक सख्त और चरणबद्ध प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि हथियार सिर्फ उन्हीं लोगों के पास जाएं, जो इसके योग्य और जिम्मेदार हैं। बंदूक का लाइसेंस लेने के लिए सबसे पहले आपको जिला पुलिस अधीक्षक (SP) से आवेदन फॉर्म लेना होता है। अब यह प्रक्रिया कई राज्यों में ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
पुलिस को आवेदन मिलते ही वे आपके पते की पुष्टि करते हैं और यह जांचते हैं कि कोई आपराधिक रिकॉर्ड तो नहीं है। इस प्रक्रिया में आपके व्यवहार, सामाजिक स्थिति और पृष्ठभूमि की गहन समीक्षा की जाती है। इसके बाद SP कार्यालय में इंटरव्यू होता है, जिसमें पूछा जाता है कि “आपको बंदूक की जरूरत क्यों है?” आपका उत्तर व्यावहारिक, संतुलित और वैध होना चाहिए। जंगली जानवरों से सुरक्षा, आत्मरक्षा, या गंभीर खतरे का सामना करने जैसे कारण स्वीकार्य माने जाते हैं।
इस प्रक्रिया में यह भी आंका जाता है कि आवेदक मानसिक और शारीरिक रूप से हथियार रखने के लिए उपयुक्त है या नहीं। सभी रिपोर्टें क्राइम ब्रांच और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) को भेजी जाती हैं। यदि सभी जांच और रिपोर्टें संतोषजनक पाई जाती हैं, तो पुलिस उपायुक्त (DCP) बंदूक का लाइसेंस जारी करने की अनुमति देते हैं।
असम में हथियार लाइसेंस की नई नीति क्यों लाई गई?
28 मई 2025 को असम सरकार ने एक अहम फैसला लेते हुए राज्य के संवेदनशील और सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले स्थानीय नागरिकों को हथियार लाइसेंस देने की योजना की घोषणा की। यह नीति धुबरी, नागांव, मोरीगांव, बारपेटा, ग्वालपाड़ा और दक्षिण सलमारा-मनकाचर जैसे जिलों पर केंद्रित है, जहां बांग्लादेशी मूल के मुसलमान बहुसंख्यक हैं और स्थानीय हिंदू समुदाय अल्पसंख्यक में है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि यह फैसला “जरूरी और संवेदनशील” है, क्योंकि इन जिलों में रहने वाले मूल निवासी लगातार असुरक्षा की भावना के साथ जी रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इन लोगों को बांग्लादेश या अपने ही गांवों से आने वाले खतरों का सामना करना पड़ सकता है।
सरकारी बयान में स्पष्ट किया गया कि: इस नीति का मकसद नागरिकों का सैन्यीकरण नहीं, बल्कि सुरक्षा और आत्मविश्वास बढ़ाना है। यह कदम गैरकानूनी गतिविधियों और बाहरी खतरों पर अंकुश लगाने के इरादे से उठाया गया है। यह मांग 1985 से लंबित थी, लेकिन अब तक किसी सरकार ने इसे लागू नहीं किया था। सीएम सरमा ने कहा कि “अगर यह फैसला पहले लिया गया होता, तो स्थानीय लोग अपनी जमीनें बेचकर पलायन नहीं करते।”





