नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । उत्तराखंड में जनसांख्यिकीय बदलाव की बहस अब और गंभीर होती जा रही है। बाहरी लोगों की आवाजाही और जमीनों पर अवैध कब्जों की घटनाएं अब जनजातीय क्षेत्रों तक भी पहुंच चुकी हैं। पड़ताल में ऐसे दर्जनों गांव सामने आए हैं, जहां की सामाजिक संरचना पूरी तरह बदल चुकी है। इन गांवों में अब मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक हो गई है, जबकि हिंदू समुदाय अल्पसंख्यक होकर सिमट गया है। राज्य में जनसंख्या संतुलन में आ रहे इस बदलाव और बाहरी घुसपैठ से जुड़े आंकड़े अब किसी से छिपे नहीं हैं। यही वजह है कि अब पहाड़ी और जनजातीय इलाकों में भी इस बदलाव की झलक साफ दिखाई देने लगी है।
देहरादून जनपद के सीमावर्ती त्यूणी क्षेत्र से चौंकाने वाले तथ्य आए सामने
मीडिया की तहकीकात में देहरादून जनपद के त्यूणी जैसे सीमावर्ती इलाके से कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र के एक दर्जन से अधिक गांवों में हिंदू आबादी धीरे-धीरे अल्पसंख्यक बनती जा रही है। साथ ही, इन गांवों में बाहरी लोगों की मौजूदगी में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जिसने इलाके की सामाजिक और जनसांख्यिकीय बनावट को काफी हद तक बदल दिया है।
कई गांवों में मुस्लिम आबादी का वर्चस्व, 40 वर्षों में बड़ा बदलाव
आज त्यूणी क्षेत्र के कई गांवों की पहचान बदल चुकी है, जहां अब मुस्लिम आबादी बहुलता में आ चुकी है। गांव पुटाड़ के अंतर्गत आने वाली धनराश बस्ती इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां बीते चार दशकों में स्थिति पूरी तरह बदल गई है। रिपोर्ट के अनुसार, पूटाड़ ग्राम पंचायत में करीब 40 साल पहले केवल एक मुस्लिम परिवार आया था, लेकिन आज वहां 30 से अधिक मुस्लिम परिवार बस चुके हैं। सुनीर गांव की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है, जहां पहले सिर्फ एक मुस्लिम परिवार था, अब 45 परिवार हो चुके हैं। हनोल क्षेत्र में भी अब 32 से अधिक मुस्लिम परिवार बस चुके हैं। यही हालात एक दर्जन से अधिक गांवों में देखने को मिल रहे हैं, जहां अब स्थायी मुस्लिम बस्तियां बन चुकी हैं।
आखिर कैसे यहां बाहरी लोग बने जमीन के मालिक?
जब मीडिया की टीम ने स्थानीय मुस्लिम निवासियों से संवाद किया, तो उन्होंने बताया कि वे कई वर्षों से इस क्षेत्र में रह रहे हैं और उनके नाम पर जमीनें भी दर्ज हैं। हालांकि, जब उनसे यह पूछा गया कि जमीन उनके नाम कैसे दर्ज हुई, तो उनके पास इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं था। इसके अलावा, इन लोगों ने वोटर कार्ड, राशन कार्ड और आधार कार्ड भी स्थानीय पते पर बनवा रखे हैं। चिंता की बात यह है कि यह पूरा इलाका जनजातीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जहां कानूनन किसी बाहरी व्यक्ति को भूमि खरीदने की अनुमति नहीं है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इन लोगों के नाम जमीनें कैसे दर्ज हो गईं और उनके दस्तावेज कैसे वैध माने गए?
वन गुर्जरों के रूप में आए मुस्लिम, अब गांवों के मालिक बन गए
बता दें कि जिन मुस्लिम समुदाय के लोगों की आज यहां आबादी बढ़ चुकी है, वे शुरू में वन गुर्जर के रूप में इस क्षेत्र में पहुंचे थे। ये लोग वन विभाग से परमिट लेकर गर्मी के मौसम में अस्थायी रूप से यहां डेरा डालते और सर्दियों में वापस लौट जाते थे। समय बीतने के साथ कुछ परिवारों ने स्थायी रूप से यहां रहना शुरू कर दिया और स्थानीय लोगों के बाग-बगीचों की चौकीदारी करने लगे। उस दौर में मुस्लिम परिवारों की संख्या केवल 44 के आसपास थी। लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या में तेज़ी से इजाफा हुआ और आज स्थिति यह है कि गांव के गांव मुस्लिम आबादी से भर चुके हैं। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, ‘सैटिंग-गैटिंग’ के जरिये कई लोगों ने यहां की जमीनें भी अपने नाम करवा लीं।
अब हालात यह हैं कि एक दर्जन से अधिक गांवों की सामाजिक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है, और वहां स्थायी मुस्लिम बस्तियां बन चुकी हैं। जनजातीय क्षेत्र में एक ही समुदाय के बाहरी लोगों का व्यवस्थित रूप से बसना और फिर कानून की अनदेखी करते हुए जमीनों पर मालिकाना हक प्राप्त कर लेना एक गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। इस स्थिति को देखते हुए आवश्यक है कि सरकार और प्रशासन तुरंत संज्ञान लें, ताकि जनजातीय क्षेत्रों को गैर-कानूनी घुसपैठियों से बचाया जा सके।





