नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। लोकसभा में उस वक्त हंगामा खड़ा हो गया, जब नेता विपक्ष राहुल गांधी ने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा के कुछ अंश पढ़ने शुरू किए। स्पीकर ने इसकी अनुमति नहीं दी और सत्ता पक्ष ने इसे नियमों के खिलाफ बताया। इसके बाद सदन की कार्यवाही तक रोकनी पड़ी।
कौन हैं जनरल मनोज मुकुंद नरवणे?
जनरल मनोज मुकुंद नरवणे भारतीय थलसेना के 27वें सेना प्रमुख रहे हैं। उन्होंने 31 दिसंबर 2019 से 30 अप्रैल 2022 तक आर्मी चीफ के रूप में सेवा दी। गलवान घाटी संघर्ष (2020) के दौरान वे सेना प्रमुख थे।
चार दशकों से ज्यादा के करियर में उन्होंने जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर, पूर्वी लद्दाख और अंतरराष्ट्रीय मिशनों में अहम जिम्मेदारियां निभाईं। वे एनडीए और आईएमए के पूर्व छात्र हैं और रक्षा अध्ययन में उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं।
किस किताब को लेकर विवाद है?
जनरल नरवणे की आत्मकथा का नाम है “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी”। इस किताब का प्रकाशन पेंग्विन रेंडम हाउस को करना है। किताब 2023-24 में प्रकाशित होनी थी, लेकिन अब तक रक्षा मंत्रालय से अनुमति नहीं मिलने के कारण यह अप्रकाशित है।
किताब में क्या लिखा है, जिस पर आपत्ति है?
इस आत्मकथा में कई संवेदनशील मुद्दों का जिक्र है, जिन पर विवाद खड़ा हो गया है गलवान, डेपसांग और पेंगोंग क्षेत्र में 2020 के हालात चीन के टैंकों की घुसपैठ और फायर खोलने की अनुमति न मिलने का दावा अग्निपथ योजना को लेकर यह कहना कि मूल प्रस्ताव अलग था, जिसे बाद में बदला गया। चीन संकट पर सरकार के नैरेटिव पर सवाल इन्हीं बातों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मानते हुए किताब को प्री-पब्लिकेशन क्लियरेंस नहीं मिली है।
किताब अब तक प्रकाशित क्यों नहीं हो पाई?
दिसंबर 2023 में किताब के कुछ अंश मीडिया में आने के बाद पूरी प्रकाशन प्रक्रिया रोक दी गई। रक्षा मंत्रालय और सेना मुख्यालय ने किताब की सुरक्षा समीक्षा शुरू की, लेकिन अब तक अंतिम मंजूरी नहीं मिली है। सेवारत अधिकारियों के लिए नियम बेहद सख्त हैं। आर्मी एक्ट के तहत वे बिना सरकार की अनुमति सैन्य ऑपरेशन, नीति, राजनीति या सेवा से जुड़ी जानकारी पर किताब या लेख प्रकाशित नहीं कर सकते। रिटायर्ड अधिकारियों के लिए नियम लिखित रूप से स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन व्यवहार में लेफ्टिनेंट जनरल या उससे ऊपर के रैंक के अफसरों को रक्षा मंत्रालय और सेना मुख्यालय से प्री-पब्लिकेशन क्लियरेंस लेनी होती है। अगर किताब में चीन, पाकिस्तान, संवेदनशील ऑपरेशन या नीति निर्माण से जुड़ी बातें हों, तो समीक्षा लगभग अनिवार्य मानी जाती है। भारत में कई पूर्व सेना प्रमुखों और वरिष्ठ अधिकारियों की आत्मकथाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। आर्मी चीफ रह चुके अधिकारियों की 8-10 आत्मकथाएं और निचले रैंक के अधिकारियों की 100 से ज्यादा किताबें पहले ही आ चुकी हैं।





