नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। दिल्ली दंगों के मामले में आरोपी उमर खालिद के वकील ने कड़कड़डूमा कोर्ट में कहा है कि यह केस किसी ठोस सबूत पर नहीं, बल्कि सिर्फ बयानों पर आधारित है। वकील का कहना है कि पुलिस ने ऐसा कोई प्रमाण पेश नहीं किया है, जो उमर खालिद की सीधी संलिप्तता दिखाए। अदालत ने अब मामले की अगली सुनवाई 28 और 29 अक्टूबर को तय की है।
वकील ने कहा- 11 महीने बाद लिए गए बयान
कोर्ट में दलील देते हुए खालिद के वकील ने कहा कि घटना के 11 महीने बाद गवाहों के बयान लिए गए, जिससे मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है। उन्होंने कहा कि न तो कोई पैसा जुटाने का आरोप है, न ही कोई बरामदगी हुई। वकील के मुताबिक, कुल 751 FIR में से सिर्फ एक FIR में उमर खालिद का नाम शामिल है।
व्हाट्सऐप ग्रुप पर भी पेश की गई सफाई
वकील ने बताया कि पुलिस ने जिन व्हाट्सऐप ग्रुप्स DPSG और MSJ का जिक्र किया है, उनमें खालिद की भूमिका सीमित थी। उन्होंने कहा कि DPSG ग्रुप में खालिद ने सिर्फ तीन मैसेज भेजे थे, जबकि MSJ ग्रुप में उन्होंने एक भी संदेश नहीं भेजा। वकील का तर्क था कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान कई महीनों या सालों बाद दर्ज किए गए, जो संदेह पैदा करते हैं।
28-29 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई
वकील ने कोर्ट में सवाल उठाया कि अगर पुलिस को पहले से किसी साजिश की जानकारी थी, तो बयान दर्ज करने में इतनी देर क्यों की गई। उन्होंने यह भी पूछा कि जो लोग चक्का जाम और प्रदर्शन में सक्रिय थे, वे गवाह कैसे बन गए और आरोपी क्यों नहीं बनाए गए। कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख 28 और 29 अक्टूबर तय की है। उमर खालिद को 13 सितंबर 2020 को गिरफ्तार किया गया था और वे अब तक 5 साल से जेल में बंद हैं। हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा था कि खालिद और शरजील इमाम की भूमिका गंभीर है, क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिक भाषणों के जरिए लोगों को भड़काया। अब खालिद ने अपनी जमानत की चुनौती सुप्रीम कोर्ट में दायर कर दी है। यह मामला दिल्ली दंगों की जांच और अभियोजन की प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े करता है। एक ओर पुलिस का दावा है कि यह सुनियोजित साजिश थी, वहीं बचाव पक्ष का कहना है कि कानूनी प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता जरूरी है।





